अमेरिकी सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटी:50 की जगह 25% की, ट्रेड डील से बागवान चिंतित, न्यूजीलैंड-EU की पहले कम की जा चुकी

अमेरिकी सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटी:50 की जगह 25% की, ट्रेड डील से बागवान चिंतित, न्यूजीलैंड-EU की पहले कम की जा चुकी




अमेरिकी सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत और न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 80 रुपए प्रति किलो कर दिया गया है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत अब अमेरिकी सेब भारत में लगभग 100 रुपए प्रति किलो की दर से पहुंचेगा। केंद्र सरकार इससे पहले न्यूजीलैंड और यूरोपियन यूनियन (EU) के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50 फीसदी से क्रमश: 25 व 20 फीसदी कर चुकी है। अब अमेरिकी सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी कम करने से हिमाचल के सेब बागवानों की चिंताएं और बढ़ गई है। इसका सीधा असर हिमाचल के 5500 करोड़ रुपए के सेब उद्योग पर पड़ेगा। विदेशों से अब सस्सा सेब देश के बाजारों में आएगा। इससे हिमाचल समेत जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के सेब को अच्छे रेट नहीं मिल पाएंगे। हिमाचल का सेब बुरी तरह पिटेगा: महेंद्र सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष महेंद्र वर्मा ने बताया कि वाशिंगटन एपल के भारतीय बाजारों में आने से हिमाचल का प्रीमियम क्वालिटी का सेब बुरी तरह पिट जाएगा। सेब बागवानों को अच्छे सेब के दाम नहीं मिल पाएंगे। उन्होंने बताया कि वाशिंगटन एपल की ज्यादा मार प्रिमियम सेब और कोल्ड स्टोर में रखे एपल पर ज्यादा पड़ेगी। उन्होंने केंद्र सरकार इस दावे को खारिज किया कि इस समझौते से पहले अमेरिकी सेब 75 रुपए प्रति किलो की दर से भारत पहुंच रहा था। उन्होंने सवाल किया यदि अमेरिकी सेब 75 रुपए में आ रहा था, तो बाजार में वह 200 से 250 रुपए प्रति किलो कैसे बिक रहा था? प्रीमियम सेब पर ज्यादा मार पड़ेगी: बिष्ठ प्रोग्रेसिव ग्रोअर्स एसोसिएशन (PGA) के अध्यक्ष लोकिंदर बिष्ट ने बताया कि प्रीमियम क्वालिटी सेब पर असर जरूर पड़ेगा, लेकिन 25 प्रतिशत आयात शुल्क और 80 रुपए का MIP कुछ हद तक स्थानीय सेब अर्थव्यवस्था को बचाएगा। उन्होंने बताया कि MIP कम से कम 100 रुपए होना चाहिए था, ताकि स्थानीय बागवानों को और सुरक्षा मिलती। बिष्ट ने कहा कि स्थानीय प्रीमियम सेब की कीमत अमेरिकी सेब से ज्यादा नहीं रह पाएगी। यदि हमारे प्रीमियम सेब की कीमत गिरेगी, तो इसका असर निम्न गुणवत्ता वाले सेब पर भी पड़ेगा।
हिमाचल के बागवान चिंता में इम्पोर्ट ड्यूटी कम करने के विरोध में हिमाचल के बागवान दो सप्ताह पहले सचिवालय के बाहर प्रदर्शन कर चुके है। इनकी मांग सेब इम्पोर्ट पर आयात शुल्क 50 से बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने की की है। मगर केंद्र सरकार बारी बारी इसे अलग अलग देशों के लिए कम कर रही है, जबकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में सुजानपुर में रैली के दौरान हिमाचल के बागवानों को सेब पर आयात शुल्क 100 फीसदी करने का वादा किया था। इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई तो नहीं गई। मगर कम जरूर की जा रही है। न्यूजीलैंड-EU और अमेरिका की आड़ में दूसरे देश भी दबाव बनाएंगे अमेरिका, न्यूजीलैंड और EU की आड़ में अब दूसरे देश भी इम्पोर्ट ड्यूटी कम करने का दबाव बनाएंगे। भारत के बाजारों में विदेशी सेब आने से देश में पैदा होने वाले सेब को उचित दाम नहीं मिल पाएंगे। बागवानों के विरोध की एक और वजह हिमाचल में अभी प्रति हेक्टेयर 7 से 8 मीट्रिक टन सेब की पैदावार होती है, जबकि न्यूजीलैंड, अमेरिका व चीन इत्यादि देशों में प्रति हेक्टेयर 60 से 70 मीट्रिक टन सेब पैदा हो रहा है। इसी तरह, चीन, अमेरिका, ईरान इत्यादि देशों की भौगोलिक परिस्थितियां अनुकूल होने से वहां भी 40 से 70 मीट्रिक टन सेब प्रति हेक्टेयर पैदा हो रहा है। हिमाचल में विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के कारण प्रति किलो सेब तैयार करने पर लगभग 27 रुपए की लागत आती है। इससे हिमाचल के सेब बागवानों को तभी फायदा हो पाता है, जब यहां के बागवानों का सेब कम से कम 50 से 100 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिके।



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