कच्छ भूकंप के 25 साल:कलेक्टर के नाम पर भुज में बसा शहर, मलबे से कच्छ को खड़ा करने वाले 6 लोगों की कहानी

कच्छ भूकंप के 25 साल:कलेक्टर के नाम पर भुज में बसा शहर, मलबे से कच्छ को खड़ा करने वाले 6 लोगों की कहानी




26 जनवरी, 2001 के दिन गुजरात के भुज जिले में भीषण भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.7 थी। करीब 700 किलोमीटर दूर तक भूकंप के झटके महसूस किए गए। कच्छ और भुज शहर में 12,000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी और करीब 6 लाख लोगों को बेघर होना पड़ा। भूकंप का सबसे ज्यादा असर कच्छ में हुआ था। कच्छ में चारों ओर सिर्फ तबाही थी। ऐसा लग रहा था कि कच्छ अब शायद कभी दोबारा खड़ा नहीं हो पाएगा। लेकिन, कच्छ के पुनर्निर्माण में ऐसे कई चेहरे रहे, जिनकी इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि और कड़ी मेहनत ने कच्छ को दोबारा खड़ा कर दिया। ऐसे ही कुछ चर्चित चेहरों की कहानी भास्कर की विशेष सीरीज कच्छ भूकंप @25 में पेश की जा रही है। 1. कच्छ भूकंप के बाद सीएम बने थे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक चर्चित सूत्र है- आपदा को अवसर में बदलना। यह विचारधारा भूकंप की त्रासदी के बाद स्पष्ट रूप से सामने आई। कच्छ भूकंप के करीब 8 महीनों बाद (3 अक्बूटर, 2001) नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। आज जो कच्छ आप देख रहे हैं, वह नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि का ही परिणाम है। इन्फ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, पोर्ट और पर्यटन के विकास के जरिए उन्होंने गुजरात के इस सबसे बड़े जिले की पूरी तस्वीर बदल दी। रेगिस्तानी कच्छ तक पानी पहुंचाया मोदी ने भूकंप में तबाह हुए हजारों घरों का पुनर्निर्माण कराया और गांवों तथा शहरों में दोबारा रौनक लौटाई। पहले सूखा क्षेत्र माने जाने वाले कच्छ की सबसे बड़ी जरूरत पानी थी। नरेंद्र मोदी ने कच्छ की प्यास बुझाने के लिए नर्मदा योजना का पानी यहां तक पहुंचाया। इससे खेती को बड़ा लाभ हुआ। इसके अलावा मोदी ने उद्योगों के लिए टैक्स में छूट दी, जिससे कच्छ में बड़े-बड़े उद्योग आए और हजारों लोगों को रोजगार मिला। आज के समय में कच्छ की गिनती एशिया के बड़े औद्योगिक केंद्रों (इंडस्ट्रियल हब) में होती है। रणोत्सव ने बदली कच्छ की तस्वीर कच्छ में पर्यटन विकास की अपार संभावनाओं को देखते हुए नरेंद्र मोदी ने 2005 में रणोत्सव की शुरुआत करवाई। पहला रणोत्सव सिर्फ तीन दिनों के लिए आयोजित किया गया था। आज वही रणोत्सव 100 से अधिक दिनों तक चलता है और दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। वर्ष 2005 से पहले जिस रण में जाने को कोई तैयार नहीं होता था, उसी रण ने आज कच्छ की एक अलग और वैश्विक पहचान बना दी है। 2. कलेक्टर बिपिन भट्ट: अपार्टमेंट मॉडल पर शहर बसाने का खाका तैयार किया बिपिन भट्ट एडिशनल कलेक्टर के पद से रिटायर हुए हैं। कच्छ में भूकंप के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। उनके नाम पर बिपिन भट्ट नगर भी बसाया गया। कच्छ के इतिहास में शायद यह पहली ऐसी घटना है, जब किसी अधिकारी के नाम पर पूरा नगर बसाया गया हो। टाउन प्लानिंग थी सबसे बड़ी चुनौती बिपिन भट्ट ने दिव्य भास्कर से विशेष बातचीत में बताया कि वर्ष 2002 में उनकी नियुक्ति भुज शहरी विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में हुई थी। उन्होंने करीब 10 महीने तक इस जिम्मेदारी को निभाया। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती नया शहरी नियोजन (टाउन प्लानिंग) करना था। रो-हाउस की बजाय अपार्टमेंट मॉडल पर शहर बसाने की योजना तैयार करने में सात दिन लगे। योजना को अंतिम रूप देने के बाद एक ही दिन में भर्ती कर काम शुरू कर दिया गया। जहां पहले इतनी संकरी गलियां थीं कि मुश्किल से स्कूटर या साइकिल निकल पाती थी, वहां अब ऐसे चौड़े रास्तों की योजना बनाई गई, जिनसे बड़े वाहन भी आसानी से गुजर सकें। इस काम में अखबारों, स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं का अच्छा सहयोग मिला। 3. सुरेश मेहता: कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित करवाया वर्ष 1969–70 में अहमदाबाद में जज के रूप में सेवा दे चुके मूल रूप से कच्छ के मांडवी निवासी सुरेश मेहता एक अनुभवी और परिपक्व राजनेता भी हैं। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता कच्छ भूकंप के समय राज्य के उद्योग मंत्री थे। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद कच्छ को दोबारा खड़ा करने के काम में सुरेश मेहता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कच्छ के लिए विशेष पैकेज घोषित करवाने में उनका अहम रोल रहा। कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित किए जाने के बाद मुंद्रा और गांधीधाम जैसे इलाकों में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए। कच्छ के लोगों को रोजगार मिल सके, इसके लिए उन्होंने बड़े उद्योगपतियों से यहां निवेश करने का निवेदन किया था। अडाणी, टाटा और वेलस्पन जैसी दिग्गज कंपनियों का कच्छ में आना सुरेश मेहता की मेहनत का ही परिणाम था। इन बड़ी कंपनियों के आने से कच्छ की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। ब्रॉडगेज लाइन को भुज तक बढ़ाने की परमिशन ली सुरेश मेहता बताते हैं- उस समय रेलवे की ब्रॉडगेज लाइन सिर्फ कांडला पोर्ट तक ही थी। मेरी मांग थी कि ब्रॉडगेज को भुज तक बढ़ाया जाए। इसके लिए मैंने कई स्तरों पर लगातार प्रयास किए। वे आगे बताते हैं- खाड़ी ऐसा इलाका था, जहां पहुंचने के लिए रापर होकर घूमकर जाना पड़ता था, जिसकी दूरी करीब 150 किलोमीटर हो जाती थी। उस समय वहां फोन की सुविधा भी नहीं थी। भूकंप के दौरान प्रमोद महाजन टेलिकॉम मंत्री थे। उन्होंने हालात देखे और हमें सैटेलाइट फोन उपलब्ध कराए। इसके बाद प्रमोद महाजन ने खड़ी गांव को गोद भी लिया। 4. रसिक ठक्कर: लगातार 18 दिनों तक वे खुद श्मशान में डटे रहे भुज पूरी तरह तबाह हो चुका था। चारों ओर मलबा फैला था और उसके नीचे अनगिनत शव दबे हुए थे, जिन्हें बाहर निकालकर अंतिम संस्कार करना जरूरी था। शहर में अलग-अलग समाजों के श्मशान थे। लोहाणा समाज का श्मशान भुज के बीचों-बीच स्थित था। उस समय रसिक ठक्कर लोहाणा समाज के अध्यक्ष थे। रसिकभाई लगातार 18 दिनों तक श्मशान में डटे रहे और 900 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार करवाया। लोग शव श्मशान में रखकर चले जाते थे रसिकभाई के बेटे घनश्याम ठक्कर बताते हैं कि हालात इतने बदतर थे कि शुरुआती दो-तीन दिनों तक श्मशान में लाशों का ढेर लगा था। किसी शव का हाथ कटा हुआ था, किसी का पैर। ज्यादातर शव मलबे में दबकर क्षत-विक्षत हो चुके थे। लोग शवों को श्मशान में रखकर चले जाते थे। यह उनकी मजबूरी थी। क्योंकि, वे लगातार शव ला रहे थे और इसके साथ ही उन्हें घायलों की देखरेख भी करनी थी। पिता रसिकभाई की सेवा को याद करते हुए उनके बेटे घनश्याम ठक्कर बताते हैं कि आपदा में पूरे परिवार ही खत्म हो गए थे। इसलिए पिताजी ने तय किया कि वे खुद शवों का अंतिम संस्कार करेंगे। उन्होंने 18 दिनों में करीब 900 शवों का अंतिम संस्कार किया। 5. अनंत दवे: भूकंप के बाद करीब 15 दिन तक भुज में रहे सांसद दिवंगत सांसद अनंत दवे भूकंप वाले दिन दिल्ली में 26 जनवरी की परेड के कार्यक्रम में मौजूद थे। जैसे ही उन्हें भूकंप की खबर मिली, वे तुरंत कच्छ पहुंचे। अनंत दवे के पुत्र देवांग दवे ने दिव्य भास्कर से बातचीत में बताया कि भूकंप की सूचना मिलते ही मेरे पिता लालकृष्ण आडवाणी के साथ कच्छ पहुंचे। सबसे पहले उन्हें यह चिंता हुई कि लोगों के खाने का क्या होगा। इसके बाद वे सीधे अमृतसर गए और पंजाब से सबसे पहला लंगर कच्छ लेकर आए। इस काम में बादल परिवार ने भी सहयोग किया। कच्छ में लंगर की व्यवस्था खड़ी की गई। देवांग दवे बताते हैं कि पिता अनंत पर कच्छ की आपदा का इतना गहरा असर हुआ था कि वे कई दिनों तक सो नहीं पाए थे। भूकंप के बाद वे करीब 15 दिन तक भुज में रहे। उस समय उनकी कार ही उनका दफ्तर और घर थी। वे रात को कार में ही सोते थे। भूकंप ने लोगों के मनोबल पर गहरा असर डाला था। ऐसे में उन्होंने हर रात भजन-कीर्तन की शुरुआत करवाई। पंडित दीनदयाल के नाम से भुज के ग्राउंड में एक ओपन एयर थिएटर बनाकर लोगों के रहने की भी व्यवस्था की। 6. पुष्पदान गढ़वी: मुंद्रा पोर्ट का भी विकास करवाया कच्छ से लोकसभा सांसद रहे पुष्पदान गढ़वी ने वर्ष 1996 से 2009 तक लोकसभा में कच्छ का प्रतिनिधित्व किया। इससे पहले वे पांच साल तक विधायक भी रह चुके हैं। उन्होंने बताया- मैं और अनंत दवे दिल्ली गए और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले। एक बार बजट सत्र के दौरान मुझे रात ढाई बजे संसद में बोलने का मौका मिला। संसद में मेरी बात सुनी गई और कच्छ में विकास कार्य तेजी से हुए। उस समय वाजपेयी ने कहा कि कच्छ में एक नया और बेहतर अस्पताल बनाना चाहिए। इसी सोच के तहत कच्छ के मौजूदा जनरल अस्पताल को AIIMS स्तर का बनाया गया। इसके लिए उस समय AIIMS का अध्ययन किया गया और उसी से प्रेरणा लेकर कच्छ के अस्पताल को विकसित किया गया। वाजपेयी ने कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित किया वाजपेयी ने हमसे पूछा था कि कच्छ को संवारने के लिए क्या किया जाना चाहिए। तब हमने फंड की कमी, सूखे की गंभीर समस्या, सड़कों के अभाव जैसी हमारी वर्षों पुरानी मांगें फिर से उनके सामने रखीं। इन सभी बातों को सुनने के बाद वाजपेयी ने कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित किया। इसके चलते यहां बड़ी-बड़ी कंपनियां आईं। इसके बाद मुंद्रा पोर्ट का भी विकास हुआ। इसी एक फैसले से कच्छ में औद्योगीकरण की शुरुआत हुई। —————– ये खबर भी पढ़ें… कच्छ भूकंप के 25 साल: तबाही के बीच पैदा हुआ बेटा, नाम रखा भूकंप; एक बच्चा 3 दिन बाद मलबे से निकला जिंदा यह 26 जनवरी 2001 की सुबह थी। घड़ी में 8.40 मिनट का समय हुआ था, तभी गुजरात के कच्छ में विनाशकारी भूकंप आया। इसी समय अंजार तालुका की वोहरा कॉलोनी में असगरअली लकड़ावाला घर के बाहर बैठे हुए थे। भूकंप के झटके आते ही वे बाहर भागे। पूरी खबर पढ़े…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

India Fontline News

Subscribe Our NewsLetter!