जयपुर बर्ड फेस्टिवल में राज्य स्तरीय कार्यशाला:पैनल डिस्कशन में सांभर लेक समेत अन्य वेटलैंड्स के संरक्षण को लेकर चर्चा
जयपुर बर्ड फेस्टिवल–2026 के तहत आज शाम जामडोली स्थित कानोता कैंप रिजॉर्ट में एक राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस दौरान पक्षियों के संरक्षण, विशेष रूप से रेप्टर्स और आउल के साथ-साथ देश- प्रदेश की आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) की चुनौतियों पर चर्चा की गई। ग्रीन पीपल सोसायटी, जयपुर चैप्टर की ओर से वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सहयोग से आयोजित कार्यशाला में देश के प्रख्यात पक्षी विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों ने सहभागिता की। सांभर लेक सहित अन्य वेटलैंड्स को लेकर चर्चा कार्यशाला के दौरान वेटलैंड्स विषय पर आयोजित पैनल डिस्कशन में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ पक्षीविद् डॉ. असद रहमानी ने अमृत सरोवर योजना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा-वर्तमान समय में देशभर की वेटलैंड्स संकट के दौर से गुजर रही हैं और इनके संरक्षण के लिए ठोस और गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है। राजस्थान वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य और एनसीटीए के पूर्व सदस्य राजपाल सिंह ने कहा- अतिक्रमण, पानी की कमी और अनियंत्रित पर्यटन गतिविधियां इनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। उन्होंने सांभर लेक सहित अन्य वेटलैंड्स पर पर्यटन के दुष्प्रभावों की चर्चा करते हुए संरक्षण के लिए स्पष्ट एसओपी तैयार करने की आवश्यकता जताई। साथ ही उदयपुर के मेनार, किशन करेरी और बड़वई क्षेत्रों में ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे संरक्षण प्रयासों की सराहना भी की। जयपुर बर्ड फेस्टिवल जैसे आयोजन पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सीईओ रवि सिंह ने जयपुर बर्ड फेस्टिवल के आयोजन की प्रशंसा करते हुए कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की जरूरत है। इस तरह के आयोजन पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने पर्यावरण और संरक्षण विषयों पर छोटे लेकिन प्रबुद्ध समूहों के संवाद को समय की मांग बताया। चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन (केसीए) अरुण प्रसाद ने सांभर लेक के संदर्भ में बताया कि यह क्षेत्र वन विभाग के प्रत्यक्ष अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, लेकिन पक्षियों की मौजूदगी के कारण यह विभिन्न विभागों के बीच समन्वय का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। उन्होंने बर्ड फ्लू जैसी परिस्थितियों में किए गए संरक्षण प्रयासों की जानकारी साझा की और वेटलैंड्स क्षेत्रों में प्रभावी पर्यटन प्रबंधन पर जोर दिया। रेप्टर्स विशेषज्ञ की बुक का विमोचन कार्यशाला के दौरान रेप्टर्स विशेषज्ञ रातुल शाह की पुस्तक Falcons of India का विमोचन किया गया। अपने प्रेजेंटेशन में शाह ने बताया कि भारत में रेप्टर्स की 108 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 60 से अधिक प्रजातियां राजस्थान में मौजूद हैं। उन्होंने रेप्टर्स की घटती संख्या पर चिंता जताते हुए इनके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। आउल विशेषज्ञ डॉ. प्राची मेहता ने उल्लुओं पर आधारित वैज्ञानिक प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि विश्व में उल्लुओं की लगभग 240 प्रजातियां पाई जाती हैं, जबकि भारत में 36 प्रजातियां मौजूद हैं। उन्होंने उल्लुओं की जीवन शैली, व्यवहार और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला और बताया कि अधिकांश प्रजातियों में मादा आउल का आकार नर से बड़ा होता है। नैनीताल से आए पद्मश्री सम्मानित फोटोग्राफर अनूप शाह ने बर्ड्स और पर्यावरण फोटोग्राफी से जुड़े व्यावहारिक अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि फोटोग्राफी किस तरह संरक्षण के लिए एक प्रभावशाली माध्यम बन सकती है। कार्यशाला का संचालन वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. सतीश शर्मा ने किया। समापन सत्र के प्रारंभ में ग्रीन पीपल सोसायटी के अध्यक्ष राहुल भटनागर ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि जयपुर बर्ड फेस्टिवल के संयोजक विक्रम सिंह ने पिछले साल के फेस्टिवल और इस वर्ष की प्रमुख गतिविधियों की जानकारी साझा की। कार्यक्रम के अंत में विक्रम सिंह ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
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