दो माह में 61 वन्यजीव तस्कर गिरफ्तार:इनमें 47 झारखंड से, प्रभावशाली लोग ग्रामीणों से कराते हैं तस्करी

दो माह में 61 वन्यजीव तस्कर गिरफ्तार:इनमें 47 झारखंड से, प्रभावशाली लोग ग्रामीणों से कराते हैं तस्करी




वन्यजीवों की अंतरराष्ट्रीय तस्करी में शामिल अपराधियों को पकड़ने के लिए वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो, पलामू टाइगर रिजर्व और वन विभाग ने दो महीने तक संयुक्त अभियान चलाया। यह कार्रवाई झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ में की गई, जिसके परिणामस्वरूप 61 तस्करों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार किए गए तस्करों में से सर्वाधिक 47 झारखंड से थे, जबकि छत्तीसगढ़ से 10 और बिहार से 4 तस्कर पकड़े गए। यह अभियान वन्यजीव अपराधों पर लगाम लगाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। सांप के जहर की दो बोतलें भी जब्त इस अभियान के दौरान बिहार और छत्तीसगढ़ से 60 किलोग्राम पैंगोलिन की खाल बरामद की गई। रांची और बिहार के बक्सर से दो रेड सैंड बोआ सांप, जमशेदपुर से 2 किलोग्राम कोरल, बिहार के दरभंगा से हिरण की दो और तेंदुए की एक खाल मिली। पलामू के हरिहरगंज से सांप के जहर की दो बोतलें भी जब्त की गईं। पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) क्षेत्र से तीन भरठूआ बंदूकें, एक मोर का पैर, बाघ की हड्डी का पाउडर, एक स्कॉर्पियो और एक मोटरसाइकिल भी बरामद की गई। यह बरामदगी तस्करों के पास मौजूद संसाधनों और उनके तौर-तरीकों को दर्शाती है। एक गुड़ व्यवसायी भी तस्करी में संलिप्त पाया गया पीटीआर के उपनिदेशक प्रजेश कांत जेना ने गुरुवार को बताया कि इस कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय गिरोहों को पकड़ने में सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि गिरफ्तार किए गए तस्करों में कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं, जिनमें मंत्रियों के रिश्तेदार और मेयर के पति जैसे व्यक्ति भी हैं। ये प्रभावशाली लोग अपने रसूख का इस्तेमाल कर वन्यजीवों की तस्करी करते हैं और भोले-भाले ग्रामीणों को छोटी रकम देकर इस अवैध धंधे में शामिल करते हैं। जांच में एक गुड़ व्यवसायी भी वन्यजीव तस्करी में संलिप्त पाया गया। पलामू टाइगर रिजर्व की सीमा छत्तीसगढ़, पलामू, गढ़वा और लातेहार तक फैली हुई है, जहां रेल और सड़क संपर्क आसान है। पीटीआर से तस्करी किए गए वन्यजीवों को कोलकाता, वाराणसी और बिहार के विभिन्न इलाकों में ले जाया जाता है। वाराणसी और बिहार के रास्ते इन्हें नेपाल भेजा जाता है, जबकि कोलकाता के रास्ते बांग्लादेश में तस्करी की जाती है। बांग्लादेश से ये वन्यजीव दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुंचते हैं। भारत, चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में वन्यजीवों के अंगों का करोड़ों का अवैध कारोबार होता है, जिसका उपयोग अंधविश्वास और पारंपरिक दवाओं में किया जाता है। झारखंड में बरामद रेड सैंड बोआ को दक्षिण पूर्व एशिया में बेचा जाना था। पैंगोलिन की खाल और सांप के जहर का उपयोग दवा बनाने में होता है, जबकि बाघ और तेंदुए के अंगों का इस्तेमाल अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाओं के लिए किया जाता है। शिकारियों का यह नेटवर्क चीन और दक्षिण पूर्व एशिया तक फैला हुआ है।



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