सतीश पूनिया के 'पद ग्रहण' का किस्सा:MLA ने पूछा- कौन सी पार्टी से हो?; खेजड़ी के लिए बदल दिया 'डिजाइन'
नमस्कार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे सतीश पूनिया ने किस्सा सुनाया और खिलकर हंस पड़े। उदयपुर की ग्रामीण सीट से विधायक की कांग्रेस की महिला नेता से नोक-झोंक हो गई। जयपुर के कोटखावदा में ‘आदेश के गुलामों’ ने खेत में खड़ी फसल बर्बाद कर दी और खेजड़ी के लिए लाखों का नुकसान उठाकर भी इमारत की डिजाइन बदल दी। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. सतीश पूनिया की जॉइनिंग और विदाई सतीश पूनिया का जवाब नहीं। राजनीति में शर्मीले किस्म के नेता माने जाते हैं, लेकिन बात गाने या हंसाने की हो तो मौका नहीं चूकते। एक इंटरव्यू में बात मुहूर्त की निकली। पत्रकार ने सवाल उठाया- आपने प्रदेशाध्यक्ष बनने से पहले मुहूर्त निकलवाया था क्या? पूनिया जी बोले- पद पर मेरी जॉइनिंग श्राद्ध पक्ष में हुई थी, शहीद दिवस पर हटा दिया गया। जवाब पूरा होते-होते पूनियाजी और पत्रकार दोनों देर तक खिलखिलाए। 2. कांग्रेस की महिला नेता से विधायकजी की नोक-झोंक विधायक जी तीन बार क्षेत्र में जीत चुके हैं। जनजातीय नेता हैं। विरोधी पार्टी को मौका ही नहीं देते। विरोधी भी मौका लपकने के लिए लालायित रहते हैं। हाल ही में विधायक जी ने कहा था कि इस साल केंद्र सरकार ने शानदार बजट दिया है। ऐसे में विरोधियों ने ‘बजट’ पर फोकस किया। एक आदिसावी की मौत पर मुआवजे की मांग की। वैसे तो आदिवासी समाज के लिए विधायकजी तैयार रहते हैं, लेकिन यहां एक युवा कांग्रेस महिला नेता धरने को लीड कर रही थीं। बस यही बात खटक रही थी। विधायकजी ने महिला नेता से ही पूछ लिया कि कौन सी पार्टी से आती हो? मैडम भी हमलावर। जवाब दिया कि आदिवासी समाज से आती हूं। चर्चा है कि महोदया की नजर उदयपुर ग्रामीण सीट पर है। धरने वाली बात अपने सोशल मीडिया पर डालकर मैडम ने दावा किया कि विधायकजी ने ‘एक रुपया भी नहीं देने’ की बात कही। विधायक ने भी सोशल मीडिया पर ही जवाब दिया। लिखा- मांगों पर सहमति बन गई। 3. ‘आदेश के गुलामों’ ने खड़ी फसल बर्बाद की जयपुर के कोटखावदा में हाईटेंशन लाइन के लिए प्रशासन ने किसानों की खड़ी फसलों को रौंद दिया। एक महिला किसान कार्रवाई के दौरान रोती-गिड़गिड़ती रही। उसने दुहाई दी। बोली- हमारे पास कोई प्रॉपर्टी नहीं है। हमारे बच्चे फसल के पीछे ही पढ़ रहे हैं। अभी तो बच्चों की फीस जमा करानी है। फसल ही नहीं रही तो मैं कहां से कराऊंगी। वहां खड़े सुरक्षाकर्मी महिला का दर्द महसूस कर रहे थे। दिलासा दे रहे थे। महिला ने कहा- तुम लोग कहो ना जाकर अपने साहब लोगों से कि खेत में फसल खड़ी है। बस दो महीने रुक जाएं। फसल कटने के बाद कार्यवाही कर लें। एक सुरक्षाकर्मी ने लाचारगी से कहा- क्या करें माताजी, हम तो ‘आदेश के गुलाम’ हैं। 4 चलते-चलते.. खेजड़ी के लिए आंदोलन चल रहा है। मामला विधानसभा से लेकर संसद तक में गूंज चुका है। दो संभाग में खेजड़ी की कटाई प्रतिबंधित कर दी गई है। लेकिन प्रतिबंधित तो बजरी खनन भी है। फिर भी बजरी माफिया एक्टिव हैं। इसलिए समाज कठोर कानून की मांग कर रहा है। बीकानेर में अनशन खत्म हो गया, लेकिन धरना जारी है। रेगिस्तानी जिलों में खेजड़ी वृक्ष नहीं बल्कि कल्पवृक्ष की तरह पूज्य है। कुदरत को पूजने वाले विश्नोई समाज के लिए तो खेजड़ी जीवन से बढ़कर है। बाड़मेर में माजीसा का भव्य मंदिर बना। नक्शे की जगह एक खेजड़ी का पेड़ खड़ा था। बनाने वाले ने लाखों का नुकसान उठाकर मंदिर का डिजाइन ही बदल दिया। खेजड़ी की एक शाख तक नहीं काटी। समाज का जो मत सदियों पहले था, वही आज भी है- विकास के लिए मान्यताओं और आस्था की बलि नहीं दी सकती।
इनपुट सहयोग- अनूप पाराशर, मुकेश हिंगड़ (उदयपुर), पुष्पेंद्र सिंह नाथावत (चाकसू, जयपुर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार को मुलाकात होगी..
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