सागर में बनेगा बीज बैंक, बी सखियां करेंगी संचालित:गांव-गांव जाकर पारंपरिक बीजों को जुटाया जाएगा

सागर में बनेगा बीज बैंक, बी सखियां करेंगी संचालित:गांव-गांव जाकर पारंपरिक बीजों को जुटाया जाएगा




सागर में पुरातन और विलुप्त हो रहे बीजों के संरक्षण के लिए पहली बार बीज बैंक बनाने की पहल शुरू की गई है। इसके संचालन के लिए महिलाओं को ‘बी सखी’ के रूप में चुना जाएगा। चयन के बाद उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा और वे गांव-गांव जाकर पारंपरिक बीजों को एकत्रित करेंगी। बढ़ते उत्पादन की दौड़ के दुष्परिणाम अधिक उत्पादन की होड़ में पारंपरिक बीज धीरे-धीरे गायब होते गए। हाइब्रिड बीजों से पैदावार तो बढ़ी, लेकिन रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग ने स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ा दीं। देशी बीजों की उपेक्षा से जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हुआ है। कलेक्टर का विशेष अभियान इन हालात को देखते हुए कलेक्टर संदीप जीआर ने जिले में बीज बैंक स्थापना का अभियान शुरू किया है। उद्देश्य है कि पुराने, उपयोगी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बीजों को फिर से संरक्षित और प्रचलित किया जाए। योजना के तहत प्रत्येक विकासखंड में कम से कम दो बी सखियों का चयन किया जाएगा। ये महिलाएं बीजों के संग्रह, संरक्षण, संवर्धन और उत्पादन बढ़ाने के तरीके सीखेंगी और आगे गांवों में काम करेंगी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन द्वारा बीज सखी प्रशिक्षण का आयोजन 17 और 18 फरवरी को किया जा रहा है। यह प्रशिक्षण आजीविका भवन खुरई में होगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम में महिला स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं शामिल होंगी। वे बी सखी के रूप में अपनी पहचान बनाएंगी और आगे बीज संरक्षण की जिम्मेदारी संभालेंगी। गांव-गांव से जुटाएंगी बीज प्रशिक्षण के बाद बी सखियां गांव-गांव जाकर पारंपरिक और विलुप्तप्राय बीजों को एकत्रित करेंगी। इसके साथ ही वे इन बीजों के दोबारा उत्पादन की प्रक्रिया भी शुरू करेंगी। बी सखियां बुजुर्ग और अनुभवी किसानों से मिलकर बीजों का इतिहास, उपयोग और उनकी खासियतों की जानकारी भी जुटाएंगी। इससे पारंपरिक खेती की समझ को फिर से मजबूत किया जाएगा। बनेगा बायोडायवर्सिटी रजिस्टर संकलित जानकारी को दस्तावेजी रूप दिया जाएगा। इसके आधार पर बायोडायवर्सिटी रजिस्टर तैयार होगा, जो भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बनेगा। इस पहल से नई पीढ़ी को देशी बीजों की विरासत से जोड़ने में मदद मिलेगी। साथ ही किसानों को स्थानीय, टिकाऊ और स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर विकल्प मिल सकेंगे।



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