युवक के फेफड़े में बन गया था ‘गुब्बारा’:1 माह से ऑक्सीजन पर था, जेएएच के डॉक्टरों ने ट्यूब से कृत्रिम सांस देकर ओपन चेस्ट सर्जरी कर बचाई जान

युवक के फेफड़े में बन गया था ‘गुब्बारा’:1 माह से ऑक्सीजन पर था, जेएएच के डॉक्टरों ने ट्यूब से कृत्रिम सांस देकर ओपन चेस्ट सर्जरी कर बचाई जान




दतिया निवासी मुकेश(40) करीब डेढ़ साल से सांस की परेशानी से जूझ रहा था। हालात ज्यादा बिगड़ने पर 22 दिसंबर को मुकेश जब मेरे पास ओपीडी में आए, तो उनकी हालत देख कलेजा कांप गया। वह पिछले डेढ़ साल से घुट-घुटकर जी रहे थे और एक महीने से तो पूरी तरह ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे। जांच की तो पता चला कि उनके फेफड़ों में बीड़ी के अत्यधिक सेवन के कारण एक बड़ा गुब्बारा (बुल्ला) बन गया था। इस गुब्बारे ने फेफड़े के फैलने की जगह ही नहीं छोड़ी थी। सर्जरी में थी चुनौती… ऑक्सीजन सप्लाई रुकती तो जा सकती थी जान यह सर्जरी बेहद चुनौती भरी थी। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि ऑपरेशन के दौरान हमें फेफड़े के उस हिस्से की ऑक्सीजन सप्लाई पूरी तरह बंद करनी थी, जहां गुब्बारा था। अगर गलती से भी ऑक्सीजन वहां पहुंच जाती, तो मरीज की टेबल पर ही मौत हो सकती थी। इसके चलते सर्जरी और एनेस्थीसिया विभाग की टीम ने मिलकर ‘थोरोकोटॉमी एंड एक्सीजन ऑफ बुल्ला’ तकनीक का इस्तेमाल करने का फैसला किया। आर्थिक स्थिति थी कमजोर, जेएएच में दी नई ​जिंदगी
मरीज की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरों में जा सके। मैंने (डॉ. अचल) तय किया कि जयारोग्य अस्पताल (जेएएच) में ही मुकेश को नई जिंदगी देंगे। मैंने असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनिल शर्मा, एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति गोयल, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शक्ति सिंघल और दोनों विभागों के जूनियर डॉक्टरों के साथ मिलकर सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया। ढाई घंटे चला संघर्ष… ट्यूब व ब्रोंकोस्कोप फेफड़े में फिट
एनेस्थीसिया टीम की मदद से हमने एक विशेष ‘डबल ल्यूमैन ट्यूब’ मंगवाई। फाइबर ऑप्टिक ब्रोंकोस्कोप के जरिए इसे फेफड़े में सटीक जगह फिट किया गया। हमने एक तरफ की ऑक्सीजन रोकी और दूसरे फेफड़े से कृत्रिम सांस बहाल रखी। ढाई घंटे तक चले इस बेहद जटिल ऑपरेशन के बाद हमने उस ‘मौत के गुब्बारे’ को काटकर बाहर निकाल दिया। ग्वालियर-चंबल संभाग में इस तरह की ओपन चेस्ट सर्जरी का यह पहला सफल मामला है। अब मुकेश बिना मशीन के खुद सांस ले पा रहे हैं।



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