जेडीए से 128फाइलें गायब, 28 इंजीनियरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?:हाईकोर्ट ने पूछा- सरकार और लोकायुक्त से मांगा जवाब; जेडीए में 13 साल पुराना मामला

जेडीए से 128फाइलें गायब, 28 इंजीनियरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?:हाईकोर्ट ने पूछा- सरकार और लोकायुक्त से मांगा जवाब; जेडीए में 13 साल पुराना मामला




जोधपुर विकास प्राधिकरण के इतिहास के सबसे बड़े और रहस्यमयी फाइल गबन घोटाले में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। वर्ष 2013 में हुए करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार और सबूत मिटाने के लिए 128 फाइलों के गायब होने के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। याचिकाकर्ता महेश गहलोत की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की कोर्ट ने प्रमुख शासन सचिव, लोकायुक्त और जेडीए अधिकारियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा है कि जांच रिपोर्ट में दोषी पाए जाने के बावजूद पिछले एक दशक से जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? मामले की अगली सुनवाई 7 मार्च 2026 को होगी। फ्लैशबैक 2013: चुनावी साल में खुली थी ‘लूट की दुकान’ याचिकाकर्ता महेश गहलोत ने अपनी याचिका में बताया है कि यह पूरा मामला 2013 का है, जो तत्कालीन सरकार का चुनावी वर्ष था। आरोप है कि उस समय जेडीए में पदस्थ उच्च अधिकारियों ने अपने चहेते ठेकेदारों और रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ा दी थीं। याचिका में 22 अप्रैल 2013 को लोकायुक्त को दी गई शिकायत का हवाला दिया गया है, जिसमें नारायण स्वामी एंटरप्राइजेज, नवदुर्गा कंस्ट्रक्शन, मातुश्री कंस्ट्रक्शन और सिद्धि विनायक कंस्ट्रक्शन जैसी फर्मों पर मेहरबानी के आरोप लगाए गए थे। आरोप था कि जेडीए के 60 से 80 प्रतिशत कार्य इन्हीं फर्मों को दिए गए। ‘मोडस ऑपरेंडी’: ऐसे लगाया गया करोड़ों का चूना याचिका में घोटाले के तरीके का सिलसिलेवार खुलासा किया गया है: फाइलें गायब होने की क्रोनोलॉजी लोकायुक्त के निर्देश पर जब जांच शुरू हुई, तो जेडीए में हड़कंप मच गया और फाइलें गायब होने लगीं। आरटीआई से खुलासा: इन अफसरों पर लटकी तलवार याचिका में आरटीआई के तहत प्राप्त उन पत्रों को भी शामिल किया गया है, जो लोकायुक्त सचिवालय ने विभिन्न विभागों को भेजे थे। इन पत्रों में उन अधिकारियों के नाम हैं, जिनके खिलाफ 16 सीसीए (गंभीर कदाचार) और 17 सीसीए की कार्रवाई लंबित है। इनमें नामजद अधिकारियों में तत्कालीन निदेशक (वित्त) रामप्रताप शर्मा, आर.पी. शर्मा, एसई रामलाल सियाग, एक्सईएन अरविंद कुमार, मोहनलाल शर्मा, भंवरलाल सुथार, एईएन जगदीश छंगाणी, सुनील बोहरा, जेईएन दीपक गोयल, जितेंद्र मेवाड़ा, अरुण पुरोहित, सहायक लेखाधिकारी नानूराम, कनिष्ठ लेखाधिकारी प्रेमप्रकाश जोशी, केवल चंद गहलोत, लेखाकार गोविंद प्रसाद और इकबाल अली के नाम शामिल थे। जांच अधिकारी ने कहा था- एफआईआर दर्ज करो जांच अधिकारी एम.के. खन्ना ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा था, “इतनी बड़ी मात्रा में पत्रावलियों का गुम होना गंभीर अनियमितताओं का संकेत देता है।” उन्होंने सिफारिश की थी कि मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जाए। इसके साथ ही तीन अभियंताओं को तुरंत निलंबित करने, ठेकेदार की सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने की अनुशंसा की गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 10 साल बीत जाने के बाद भी न तो एफआईआर हुई और न ही किसी बड़े अफसर पर गाज गिरी। केवल कुछ का तबादला कर खानापूर्ति कर दी गई। विधानसभा के विशेषाधिकार की आड़ याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि जब उन्होंने इन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई की जानकारी आरटीआई में मांगी, तो संयुक्त विधि परामर्शी ने यह कहकर मना कर दिया कि यह मामला विधानसभा के विशेषाधिकार से जुड़ा है और रिपोर्ट अभी सदन के पटल पर नहीं रखी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि घोटाला अधिकारियों ने किया है, न कि मंत्रियों ने, इसलिए इसे छिपाना गलत है। अब आगे क्या? हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य सचिव, नगरीय विकास विभाग, कार्मिक विभाग और जेडीए से जवाब मांगा है। इस मामले में 7 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार को बताना होगा कि 128 फाइलों के गायब होने के बावजूद एफआईआर क्यों नहीं हुई और दोषी अधिकारियों को अब तक क्यों बचाया जा रहा है?



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