FIR दर्ज कराने वाली मां को ही मुल्जिम बना दिया:मासूम बेटी की हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट ने तय किए आरोप, हाईकोर्ट ने पलटा फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाले मामले में निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक माँ पर ही अपनी 6 महीने की बेटी की हत्या का आरोप तय (चार्ज फ्रेम) कर दिया गया था। मामला फलोदी जिले के बाप थाना क्षेत्र का है। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता रीमा (30) की पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) को स्वीकार करते हुए कहा कि पुलिस ने इस मामले में “पक्षकारों की भूमिका ही बदल दी” और शिकायतकर्ता को ही आरोपी बना दिया। कोर्ट ने इसे लोअर कोर्ट की “यांत्रिक प्रक्रिया” बताते हुए आदेश को खारिज कर दिया और मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि खुद रीमा ने ही अपनी 6 महीने की बेटी काश्वी की हत्या की शिकायत दर्ज करवाई थी, लेकिन जांच में पुलिस ने आरोपी बनने वाले पति और ससुराल वालों को बचाकर उन्हें ही आईपीसी की धारा 302 में आरोपी बना दिया था। 10-11 फरवरी 2021 का दु:खद घटनाक्रम याचिकाकर्ता रीमा, जो वर्तमान में झालावाड़ में वन संरक्षक के पद पर कार्यरत हैं, की शादी 2014 में फलोदी जिले के बाप थाना इलाके के नेवा कानासर निवासी विकास से हुई थी। विकास भी उप वन संरक्षक हैं। उनके दो बच्चे थे- बेटा विहान (ढाई साल) और बेटी काश्वी (6 महीने)। रीमा ने अपनी एफआईआर में आरोप लगाया था कि शादी के तुरंत बाद से ही पति विकास, ससुर दौला राम और सास वर्जू ने उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि उनकी मासिक सैलरी नियमित रूप से पति द्वारा निकाल ली जाती थी। पति बेटी के जन्म से नाराज और असंतुष्ट रहते थे। 10 फरवरी 2021 की रात करीब 9 बजे, रीमा को पति और ससुराल वालों ने बेरहमी से प्रताड़ित किया। आरोप है कि पति ने 6 महीने की बेटी काश्वी का गला दबा दिया। जब रीमा ने उसे बचाने की कोशिश की, तो तीनों ने उन्हें जबरन जहर पिला दिया, जिससे वह लगातार उल्टी करने लगीं और कमजोर हो गईं। उस हालत में उन्होंने ससुर के मोबाइल से अपने पिता को फोन किया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी जान बच गई, लेकिन 6 महीने की बेटी की मौत हो गई। पर्चा बयान से एफआईआर, पुलिस जांच में उलटफेर 11 फरवरी 2021 को रीमा के पर्चा बयान के आधार पर बाप थाने में FIR दर्ज की गई। जांच के दौरान रीमा का बयान डाइंग डिक्लेरेशन के रूप में और सीआरपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने भी दर्ज किया गया। दोनों बयानों में उन्होंने लगातार अपने पति और ससुराल वालों पर ही आरोप लगाए। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, उल्टी के नमूने और कथित जहरीले पदार्थ के नमूने एकत्र किए। मृत बच्ची की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी प्राप्त की गई और कई गवाहों के बयान दर्ज किए गए। हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने चार्जशीट पेश करते समय, रीमा के धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिए गए बयान और पर्चा बयान के बावजूद, पति विकास, ससुर दौलाराम और सास वरजू को बरी कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से पुलिस ने पक्षकारों की भूमिका पलट दी और रीमा (जो शिकायतकर्ता थीं) को ही आरोपी बना दिया। रीमा को गिरफ्तार भी किया गया, जिसे बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिली। हाईकोर्ट: निचली अदालत ने बिना देखे तय किए आरोप हाईकोर्ट ने कहा कि फलोदी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पुलिस की थ्योरी पर भरोसा करते हुए 18 मार्च 2025 को रीमा के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत आरोप तय कर दिए। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि निचली अदालत ने 18 मार्च 2025 का आदेश पारित करते समय अपने ‘न्यायिक विवेक’ का इस्तेमाल नहीं किया। आदेश में यह नहीं बताया गया कि आखिर किस आधार पर और किन सबूतों को देखते हुए मां पर हत्या का आरोप तय किया गया है। हाईकोर्ट ने कहा- यह ‘मैकेनिकल’ आदेश है जस्टिस फरजंद अली ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि निचली अदालत का आदेश “संक्षिप्त और अस्पष्ट” है। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने जिस तरह शिकायतकर्ता को ही आरोपी बना दिया, उस विशिष्ट तथ्यात्मक पृष्ठभूमि पर निचली अदालत ने गौर ही नहीं किया। हाईकोर्ट ने 18 मार्च 2025 के आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है। मामले को वापस ट्रायल कोर्ट (फलोदी) भेजा गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अभियोजन और आरोपी दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के मुताबिक नए सिरे से विस्तृत और तर्कसंगत आदेश पारित किया जाए। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि क्या धारा 302 का मामला बनता है या नहीं, इस पर मेरिट पर कोई राय नहीं दी गई है। यह तय करना ट्रायल कोर्ट का काम होगा।
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