टॉयलेट देख भड़के MLA साहब:डिप्टी CM मैडम ने बचाया 'ईंधन'; सांसद महोदय का 'हरियाला अवतार'

टॉयलेट देख भड़के MLA साहब:डिप्टी CM मैडम ने बचाया 'ईंधन'; सांसद महोदय का 'हरियाला अवतार'




नमस्कार कोटा में भयंकर गर्मी में गऊ माता पर छिड़काव हुआ। RLP फैन्स ने नेताजी को ‘हरियाला’ लुक दिया। डिप्टी सीएम मैडम ने जयपुर-अजमेर के बीच ट्रेन में सफर कर ‘कनेक्टिविटी’ बढ़ाई। सांचौर में हॉस्पिटल का टॉयलेट देख विधायकजी उखड़ गए और अलवर में स्कूल की शेप बच्चों को लुभा रही है। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. गर्मी और नेताजी वाली ‘हरियाली’ गर्मी से हालत खराब है। समस्त जीव हलकान हैं। सनातन प्रेमियों को गऊ माता की खास चिंता। कोटा में भगवा गमछा गले में डालकर गर्मी से भांय-भांय करती गायों पर ठंडे पानी का छिड़काव कर दिया गया। दूसरे जानवर यह देख क्रांति कर सकते हैं। लेकिन पारा कुछ उतरने के बाद। अभी तो दोपहर में सड़क पर उतरना ही जान से खेलना है। हालांकि अजमेर में सड़कों पर दुपहिया दौड़ाने वालों के लिए हरे शामियाने टांग दिए गए हैं। अब आंधी-तूफान न आया तो बत्तियों पर थोड़ी राहत मिलेगी। पारे ने पर्यटन की हवा भी निकाल रखी है। उदयपुर की पिछोला झील पर दुपहरी में बतखें तक नहीं उतर रहीं। सैर-सपाटा अपनी जगह, सूर्यदेव से दुश्मनी कौन मोल ले? दोपहर में घर में पड़े-पड़े कुछ क्रिएटिव करने वालों की भी कमी नहीं। अब देखिए हनुमान बेनीवाल का हरियाला AI अवतार ही गढ़ लिया। बस, इसे गायों से बचाने के लिए जालियों में ढंककर रखना पड़ेगा। गोशाला में बौछारों से तरावट पाकर चराई के लिए इधर न आ जाएं। 2. ट्रेन में डिप्टी CM मैडम का सफर वे भी क्या ही दिन थे जब नेता-अभिनेता ट्रेन के पहले-दूसरे दर्जे में सफर किया करते थे। यह भी शान की बात थी। तब ईंधन की कमी नहीं थी। क्योंकि रोटियां चूल्हे पर बनती थीं और लकड़ी आस-पास से बीन-चुगकर जुटा ली जाती थी। फिर ईंधन आ गया। नेता-अभिनेता कारों से चलने लगे। हेलिकॉप्टर-हवाई जहाज से चलने लगे। प्राइवेट जेट से चलने लगे। युद्ध के कारण ईंधन का संकट आ गया। अब मुसाफिरों को अपने प्रिय नेतागण के साथ यात्रा करने का सौभाग्य मिल रहा है। वे वाले डिप्टी सीएम बस में मिल सकते हैं और ये वाली डिप्टी सीएम मैडम ट्रेन में मिल सकती हैं। मैडम ने ट्रेन में जयपुर-अजमेर का सफर किया। इस दौरान आम यात्रियों से गजब की कनेक्टिविटी बढ़ाई। बच्चों से बात की। यात्रियों से रेलवे के सफर के सवाल पूछे। बच्चों को गोद में बैठाया। महिलाओं से सुख-दुख की बात की। कुल मिलाकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट लोगों को आपस में जोड़ता है। आपस में एक दूसरे से जुड़ना ही तो राष्ट्रवाद है। 3. हॉस्पिटल का टॉयलेट देख भड़के विधायकजी सरकारी हॉस्पिटल में सफाई का टेंडर बहुत ऊंची रकम पर छूटता है। सवाल यह कि महंगे टेंडर के बाद भी सरकारी अस्पताल गंदे क्यों मिलते हैं? हांलाकि यह शर्तिया कहा जा सकता है कि विधायकजी इस सवाल का उत्तर जानते हैं। इसके बावजूद वे सफाई व्यवस्था का निरीक्षण करने पहुंच गए। मुद्दा सफाई का था इसलिए उन्होंने टॉयलेट से शुरुआत की। टॉयलेट की दशा वैसी थी जैसी सरकारी हॉस्पिटल के टॉयलेट की हो सकती है। फिर भी दशा देखकर विधायकजी भड़क गए। नेतागण जब आमजन की समस्याओं से जुड़े मुद्दे पर भड़कते हैं तो निश्चित ही उनके आस-पास उस गुस्से को शूट करने के लिए कोई न कोई अनुचर जरूर होता है। वहां भी था। विधायकजी ने टॉयलेट का दरवाजा धकिया कर कहा- देखो हालत। ये क्या है? और यह दूसरा भी देखो। और यह तीसरा भी देखो। वे भड़के- कौन देखता है यहां सफाई का काम। अधिकारी ने नाम बताया। नेताजी जारी रहे- यह सफाई है? सिंक के नीचे चार रुपए का पाइप तक नहीं लगा है। कचरे की बाल्टी अभी तक भरी पड़ी है। कर्मचारी ‘जी वो यूं है कि…’ जैसी भाषा बोलते हुए मिमियाने लगे। तब तक विधायकजी के मुंह से इंग्लिश निकलने लगी- इट शुड बी डिस्पोज अर्ली मॉर्निंग इट सेल्फ। जिसका कुछ भी अर्थ निकालकर कर्मचारी ने सहमति दे दी। विधायकजी वार्ड में गए वहां कूलर चल रहा था। कूलर में पानी नहीं था। विधायकजी ने अस्पताल के अधिकारी को कूलर के सामने खड़ा कर दिया। बोले- ये लू लगाने की मशीन है। नेताजी के भड़के होने के कारण हंसी की बात पर भी किसी ने हंसने की जुर्रत नहीं की। 4. चलते-चलते… एक बहुत ही सकारात्मक शब्द है- माहौल। हालांकि विविध परिप्रेक्ष्य में इस शब्द का अर्थ अपने-अपने मतानुसार बनाया जा सकता है। माहौल का जीवन में बड़ा महत्व है। इंसान जो पाना चाहता है, उसके लिए अगर माहौल बनाना आरंभ कर दे, तो इच्छित वस्तु, संसाधन या पद अवश्य मिल जाता है। राजनीति में तो इसका जबरदस्त प्रयोग होता है। 10 रुपए के चटपटे आहार से भी माहौल बनाया जा सकता है। यहां बात शिक्षा के माहौल की है। अलवर के मालाखेड़ा के छोटे से गांव इंद्रगढ़ में सरकारी स्कूल के परिसर में एक कमरा बना दिया गया। वैसे तो स्कूल के भवन में पर्याप्त कमरे थे। लेकिन यह खास कमरा खास माहौल बनाने के लिए था। कमरे को चार पिलर पर उठाया गया। इसके बाद इसे एरोप्लेन का आकार दिया गया। प्लेन जैसा ही रंगरोगन किया गया। दूर से देखने पर भ्रम होता कि स्कूल में कोई हवाई जहाज उतर आया है? इमरजेंसी लैंडिंग तो नहीं हो गई? माहौल बन गया। बच्चों को और क्या चाहिए। हवाई जहाज वाले स्कूल में पढ़ेंगे। इस खास कमरे में आकर बच्चों के चेहरे की खुशी देखते ही बनती है। खिड़की से अपने साथियों को आवाज देकर कहते हैं- जा रहा हूं अमेरिका। ये ढांचा वह तरकीब है जिसके जरिए बच्चों के नन्हे सपनों को उड़ान दी जा सकती है। यही शिक्षा का उद्देश्य है। इनपुट सहयोग- शक्ति सिंह प्रजापत (मालाखेड़ा, अलवर), विक्रम गर्ग (सांचौर, जालोर), शिवम ठाकुर (जयपुर), भरत मूलचंदानी (अजमेर), सतीश शर्मा (उदयपुर), नितिश शर्मा (कोटा)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।



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