नक्सली इलाकों में VIP मूमेंट्स संभालने वाले रामावतार को प्रेसिडेंट-मेडल:रायुपर की एकमात्र महिला टीआई अर्चना को दो पुरस्कार, महिलाओं-बच्चों से जुड़े केस में किया बेहतर काम
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पुलिस विभाग के दो अधिकारियों की सेवा और उपलब्धियां खास चर्चा में हैं। एक ओर विशेष सेवा के लिए राष्ट्रपति पदक पाने वाले रामावतार सिंह हैं, जिन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में VIP बंदोबस्त, चुनाव और कानून व्यवस्था की चुनौतीपूर्ण ड्यूटी निभाई। वहीं दूसरी ओर रायपुर शहर की एकमात्र महिला टीआई अर्चना धुरंधर हैं, जिन्हें महिलाओं और अवयस्क बच्चों से जुड़ी शिकायतों के त्वरित निराकरण और पारिवारिक विवादों में सुलह कराने के लिए राज्यपाल पुरस्कार और रानी सुबरन कुंवर पुरस्कार मिला है। नक्सल प्रभावित इलाकों में VIP मूवमेंट संभालना बड़ी चुनौती रामावतार सिंह ने अपने अब तक की सर्विस में ऐसे इलाकों में भी ड्यूटी की, जहां नक्सल गतिविधियों का असर था। उन्होनें बताया इन क्षेत्रों में VIP मूवमेंट सामान्य शहरों की तरह आसान नहीं होता था। सुरक्षा के लिए पहले से पूरी प्लानिंग करनी पड़ती थी। VIP के रूट से लेकर फोर्स की तैनाती, जवानों के ठहरने की व्यवस्था और पूरे बंदोबस्त की मॉनिटरिंग तक कई स्तरों पर तैयारी होती थी। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण रूट और सुरक्षा व्यवस्था में अतिरिक्त सावधानी बरती जाती थी। रामावतार ने बताया कि VIP ड्यूटी में सिर्फ सड़क पर जवान तैनात करना ही काम नहीं होता। कार्यक्रम स्थल, रूट और आसपास के इलाकों का आकलन कर यह तय किया जाता है कि किस जगह कितनी फोर्स की जरूरत होगी और पूरे बल को किस तरह मैनेज करना है। चुनाव और कानून व्यवस्था में भी निभाई अहम जिम्मेदारी रामावतार सिंह ने निर्वाचन ड्यूटी में भी जिम्मेदारियां निभाईं। चुनाव के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ मतदान केंद्रों और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना पुलिस की बड़ी जिम्मेदारी होती है। उनके लंबे सेवाकाल में VIP बंदोबस्त, निर्वाचन ड्यूटी, कानून व्यवस्था समेत कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां शामिल रहीं। इन्हीं विशेष सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। सम्मानित अधिकारियों की सूची में उनका नाम सबसे ऊपर रहा, जिसे उन्होंने अपने लिए गर्व का पल बताया। महिलाओं और बच्चों के मामलों में धैर्य और भरोसा सबसे जरूरी दूसरी ओर अर्चना धुरंधर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में काम कर रही हैं। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे जरूरी शिकायतकर्ता की बात धैर्य से सुनना और उसे भरोसा दिलाना है। उन्होंने बताया कि कई बार महिलाएं और बच्चे काफी डरे या परेशान होकर थाने पहुंचते हैं। ऐसे में पहले उन्हें सहज किया जाता है। उन्हें बैठने, पानी पीने और शांत होने का समय दिया जाता है। इसके बाद उनकी पूरी बात सुनकर कानूनी जानकारी के आधार पर कार्रवाई की जाती है। अर्चना के मुताबिक, शिकायतकर्ता को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि उसकी समस्या का समाधान किया जाएगा। जब भरोसा बनता है तो महिला या बच्चा अपनी पूरी बात खुलकर बता पाता है। 4 साल की बच्ची का केस आज भी याद अर्चना ने अपने सेवाकाल के उस मामले को भी याद किया, जिसने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि 2011 में राजनांदगांव में महिला चौकी प्रभारी रहते हुए उनके पास 4 साल की बच्ची से रेप का मामला आया था। मामले में तत्काल कार्रवाई करते हुए बच्ची को सुरक्षित बचाया गया और आरोपी को सजा भी दिलाई गई। अर्चना ने बताया कि वह बच्ची आज भी उनके काफी करीब है। उन्होंने कहा कि समय पर कार्रवाई और वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन से बच्ची को न्याय मिल सका। आज बच्ची स्वस्थ है और आरोपी को भी सजा मिल चुकी है। उनके लिए इस केस की सबसे बड़ी संतुष्टि यही है कि बच्ची को न्याय मिला। 2008 से पुलिस सेवा में हैं अर्चना अर्चना धुरंधर 2008 से सब इंस्पेक्टर के रूप में पुलिस सेवा में हैं। वह अपने पुरस्कारों के लिए नामांकन का श्रेय वरिष्ठ अधिकारियों, सहकर्मियों, कर्मचारियों और काउंसलर्स की पूरी टीम को देती हैं। उनके मुताबिक, राज्यपाल पुरस्कार और रानी सुबरन कुंवर पुरस्कार महिलाओं और अवयस्क बच्चों की शिकायतों के त्वरित निराकरण और पारिवारिक विवादों में सुलह कराने के काम के लिए दिए जाते हैं। दो अलग जिम्मेदारियां, एक ही लक्ष्य- सेवा रामावतार सिंह और अर्चना धुरंधर की जिम्मेदारियां भले अलग रही हों, लेकिन दोनों के काम में एक बात समान है- चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में लोगों की सुरक्षा और उन्हें न्याय दिलाना। रामावतार ने नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था और VIP मूवमेंट जैसी चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। तो अर्चना ने महिलाओं और बच्चों की शिकायतों को संवेदनशीलता के साथ सुना और उनके निराकरण पर काम किया। एक को विशेष सेवा के लिए राष्ट्रपति पदक मिला है, जबकि दूसरे को दो महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले हैं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दोनों पुलिस अधिकारियों की सेवा की यह कहानी पुलिसिंग के दो अलग लेकिन महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाती है।
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