NCLT Verdict Subhash Chandra Zee Group Debt Settlement


33 मिनट पहले

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डॉ. सुभाष चंद्रा जी ग्रुप के फाउंडर है। NCLT ने पर्सनल इनसॉल्वेंसी केस में ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है।

NCLT ने जी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा को ₹22 हजार करोड़ के कर्ज को महज ₹6.5 करोड़ में निपटाने के प्लान को मंजूरी दी है। इससे कर्ज देने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपने 99.97% बकाए पैसे का नुकसान सहना पड़ेगा।

सुभाष चंद्रा के कर्ज निपटारे से जुड़ी हर जानकारी, 10 सवाल-जवाब में…

सवाल 1. NCLT ने सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में क्या फैसला सुनाया है?

जवाब: इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल NCLT ने सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 114 के तहत मंजूरी दे दी है। इसके तहत सुभाष चंद्रा को ₹22,006.57 करोड़ के कुल कर्ज के बदले महज ₹6.5 करोड़ का भुगतान करना होगा। इसके बाद उनका बाकी का पूरा ₹22,000 करोड़ से अधिक का बकाया कानूनी तौर पर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

सवाल 2. यह फैसला किसने सुनाया और ट्रिब्यूनल में राय क्या थी?

जवाब: इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में इस मामले को लेकर विभाजित राय आई थी। इसके बाद NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य के रूप में जुडिशियल मेम्बर नीलेश शर्मा को नियुक्त किया। नीलेश शर्मा ने बहुमत के आधार पर 144 पन्नों के आदेश में रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी।

सवाल 3. क्या सुभाष चंद्रा ने खुद ₹22,006 करोड़ का पर्सनल लोन लिया था?

जवाब: नहीं, यह रकम सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई ‘पर्सनल गारंटी’ से जुड़ी है। जब किसी कंपनी या मूल कर्जदार को बैंक लोन देते हैं, तो कई बार प्रमोटर अपनी व्यक्तिगत गारंटी देता है कि अगर कंपनी भुगतान नहीं कर पाई, तो वह इसे चुकाएगा।

एस्सेल ग्रुप की कंपनियों के लिए गए लोन के लिए सुभाष चंद्रा ने पर्सनल गारंटी दी थी। कंपनियों के डिफॉल्ट करने पर यह क्लेम सुभाष चंद्रा पर आ गया। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने यह सारा पैसा व्यक्तिगत तौर पर उधार लिया था।

सवाल 4. यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था?

जवाब: यह पूरा मामला साल 2016 में शुरू हुआ था, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (IHF) ने कुछ कंपनियों को ₹726 करोड़ का लोन दिया। 2018 में डॉ. सुभाष चंद्रा इस लोन के पर्सनल गारंटर बने, यानी कंपनी के पैसे न चुकाने पर उन्हें यह रकम भरनी थी।

जब कंपनियों ने डिफॉल्ट किया, तो इंडियाबुल्स ने 2022 में सुभाष चंद्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। 2024 में NCLT ने इस केस को आगे बढ़ाया।

अब सवाल उठता है कि मामला ₹178 करोड़ के नोटिस से शुरू होकर ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुंचा? दरअसल, नियम यह है कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके सारे कर्जदाता अपना-अपना बकाया मांगने आ जाते हैं।

सुभाष चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप की दूसरी कंपनियों के कर्जों के लिए भी HDFC, एक्सिस, कैनरा और RBL जैसे कई अन्य बैंकों को पर्सनल गारंटी दे रखी थी।

इन सभी बैंकों के पुराने कर्जों, सालों के भारी-भरकम ब्याज और पेनल्टी को आपस में मिलाकर कुल क्लेम ₹22,006.57 करोड़ हो गया। इसी ₹22,000 करोड़ के बकाए के बदले अब NCLT ने ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है।

सवाल 5. किस प्रमुख बैंक या संस्थान ने इस फैसले का विरोध किया था?

जवाब: LIC हाउसिंग फाइनेंस की अगुआई में कुछ कर्जदाताओं ने इस रीपेमेंट प्लान पर आपत्ति जताई थी। LIC हाउसिंग ने इसे “अव्यवहारिक और गैर-कानूनी” बताते हुए कहा था कि उन्हें ₹1,322.39 करोड़ के बकाए के बदले केवल ₹38.09 लाख दिए जा रहे हैं।

सवाल 6. NCLT ने असहमति जताने वाले लेनदारों की आपत्तियों को क्यों खारिज किया?

जवाब: NCLT ने पाया कि विरोध करने वाले लेनदारों के पास 20% से भी कम वोटिंग शेयर थे। रीपेमेंट प्लान को 80.81% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों की जरूरी मंजूरी मिल चुकी थी। कानून के मुताबिक, बहुमत की मंजूरी के कारण ट्रिब्यूनल ने आपत्तियों को खारिज कर दिया।

सवाल 7. NCLT ने चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को सही ठहराने के लिए क्या तर्क दिया?

जवाब: ट्रिब्यूनल ने कहा कि रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के अनुसार सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य प्लान में दी गई राशि से कम है। अगर यह प्लान खारिज होता, तो चंद्रा दिवालिया घोषित हो जाते और लेनदारों को इससे भी कम राशि मिलती। प्लान मंजूर होने से चंद्रा आर्थिक रूप से दोबारा खड़े हो सकेंगे और मूल देनदारों से भविष्य में वसूली की संभावना बनी रहेगी।

सवाल 8. अब इस केस की आगे की प्रक्रिया क्या होगी?

जवाब: कोर्ट की मंजूरी के बाद, अब रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल सभी लेनदारों की एक अंतिम सूची बनाएगा। इसके बाद ₹6.5 करोड़ की रकम को इन सभी बैंकों और लेनदारों में नियम के अनुसार बांटा जाएगा। आखिर में, यह मामला दोबारा इंसॉल्वेंसी अदालत की मुख्य बेंच के पास जाएगा। वहां से औपचारिक कानूनी मोहर लगते ही यह केस पूरी तरह से बंद हो जाएगा।

सवाल 9. क्या इसका मतलब यह है कि बैंकों का ₹22,000 करोड़ का कर्ज पूरी तरह डूब गया?

जवाब: नहीं, 99.97% का हेयरकट केवल सुभाष चंद्रा की ‘व्यक्तिगत गारंटी’ के क्लेम पर लागू होता है। जिन मूल कंपनियों ने लोन लिया था, वे अब भी कर्जदार बनी हुई हैं।

बैंक उन कंपनियों, उनकी संपत्तियों और अन्य गिरवी रखे गए कोलेटरल से अपनी वसूली जारी रख सकते हैं। NCLT ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि क्रेडिटर्स के पास मूल कर्जदारों से वसूली का अधिकार बना रहेगा।

सवाल 10. इस फैसले का भारतीय बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?

जवाब: यह फैसला आने वाले ऐसे सभी मामलों के लिए एक बड़ी मिसाल बनेगा। इससे साफ संदेश मिलता है कि अगर 75% से ज्यादा कर्ज देने वाले बैंक या लोग किसी रीपेमेंट प्लान पर राजी हो जाते हैं, तो अदालत उनके इस कारोबारी फैसले को ही सर्वोच्च मानेगी।

फिर भले ही बैंकों को उनका 99% से ज्यादा पैसा छोड़ना पड़े और रिकवरी के नाम पर सिर्फ नाममात्र की रकम ही क्यों न मिले।



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