APJ Abdul Kalam Atal Bihari President Offer; Ashok Tandon Book | LK Advani | कलाम की जगह भाजपा वाजपेयी को राष्ट्रपति बनाना चाहती थी: किताब में दावा- BJP ने अटलजी से कहा था, आप आडवाणी को PM बनने दीजिए

APJ Abdul Kalam Atal Bihari President Offer; Ashok Tandon Book | LK Advani | कलाम की जगह भाजपा वाजपेयी को राष्ट्रपति बनाना चाहती थी: किताब में दावा- BJP ने अटलजी से कहा था, आप आडवाणी को PM बनने दीजिए


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नई दिल्ली17 मिनट पहले

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आडवाणी और वायपेयी की एकदूसरे को गले लगाते यह तस्वीर 13 जनवरी, 2000 में दिल्ली में एक पार्टी समारोह के दौरान ली गई थी।

भारत के 11वें राष्ट्रपति के लिए भाजपा ने साल 2002 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रपति पद ऑफर किया था। पूर्व PM वाजपेयी के करीबी अशोक टंडन ने अपनी किताब ‘अटल संस्मरण’ में इसका खुलासा किया है।

इस किताब के मुताबिक भाजपा ने वाजपेयी से कहा था, ‘पार्टी चाहती है कि आपको राष्ट्रपति भवन चले जाना चाहिए। आप प्रधानमंत्री पद लाल कृष्ण आडवाणी को सौंप दीजिए।’ हालांकि, वाजपेयी ने इस प्रस्ताव को साफ ठुकरा दिया। टंडन के अनुसार, वाजपेयी ने कहा था- मैं इस तरह के किसी कदम के पक्ष में नहीं हूं। मैं इस फैसले का समर्थन नहीं करूंगा।

टंडन ने 17 दिसंबर, 2025 को वाजपेयी की बर्थ एनिवर्सरी पर ‘अटल स्मरण’ किताब लॉन्च की है। टंडन 1998 से 2004 तक वाजपेयी के मीडिया सलाहकार थे। वहीं, वाजपेयी 1999 से 2004 तक, 5 साल का पूरा कार्यकाल पूरा करने वाले देश के पहले गैर-कांग्रेसी PM थे।

NDA ने 2002 में 11वें राष्ट्रपति चुनाव में कलाम को अपना उम्मीदवार बनाया था। कलाम के सामने कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार लक्ष्मी सहगल थीं। हालांकि, कांग्रेस समेत प्रमुख विपक्षी दलों के सांसदों और विधायकों ने कलाम के समर्थन में वोट किया। कलाम ने 25 जुलाई 2002 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली।

किताब में दावा- सोनिया-मनमोहन के साथ मीटिंग में कलाम के नाम की घोषणा हुई

टंडन की किताब में बताया गया है कि वाजपेयी चाहते थे कि देश का 11वां राष्ट्रपति पक्ष-विपक्ष की सर्वसम्मति से बने। इसके लिए उन्होंने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सीनियर नेताओं को बातचीत के लिए आमंत्रित किया था। इस बैठक में सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी और डॉ. मनमोहन सिंह शामिल हुए।

इसी बैठक में वाजपेयी ने पहली बार औपचारिक रूप से बताया कि NDA ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला लिया। टंडन के अनुसार, इस घोषणा के बाद बैठक में कुछ देर के लिए सब मौन हो गए।

सोनिया गांधी ने चुप्पी तोड़ते हुए वाजपेयी से कहा, ‘हम लोग कलाम के नाम के सिलेक्शन को लेकर हैरान हैं। हालांकि, इस पर विचार करने के अलावा हमारे पास कोई ऑप्शन नहीं है। हम आपके प्रस्ताव पर चर्चा करेंगे और फिर फैसला लेंगे।’

भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस बीएन किरपाल (बाएं) ने 25 जुलाई, 2002 को दिल्ली स्थित पुरानी संसद के सेंट्रल हॉल में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति कलाम को शपथ दिलाई थी।

‘वाजपेयी-आडवाणी में नीतिगत मतभेद, फिर भी रिश्ते खराब नहीं हुए’

अशोक टंडन ने अपनी किताब में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के संबंधों का भी जिक्र किया है। टंडन ने लिखा- कुछ नीतिगत मतभेदों के बावजूद दोनों नेताओं के रिश्ते कभी सार्वजनिक रूप से खराब नहीं हुए।

टंडन के अनुसार, आडवाणी हमेशा वाजपेयी को अपना नेता और प्रेरणा स्रोत बताते थे, जबकि वाजपेयी आडवाणी को अपना ‘अटल साथी’ बताते थे। किताब के अनुसार, वाजपेयी और आडवाणी की साझेदारी भारतीय राजनीति में सहयोग और संतुलन का प्रतीक रही। दोनों ने न केवल भाजपा का निर्माण किया, बल्कि पार्टी और सरकार, दोनों को नई दिशा दी।

संसद हमले के समय सोनिया ने अटल से फोन पर खैरियत पूछी थी

टंडन ने अपनी किताब में 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले का भी जिक्र किया है। उस समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और वाजपेयी के बीच फोन पर बातचीत हुई थी। हमले के वक्त वाजपेयी अपने आवास पर थे और सहयोगियों के साथ टीवी पर सुरक्षाबलों की कार्रवाई देख रहे थे।

टंडन ने किताब में लिखा- हमले के दौरान वाजपेयी को सोनिया गांधी का फोन आया। उन्होंने वाजपेयी से कहा कि मैं आपकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। इसके जवाब में वाजपेयी ने कहा- मैं सुरक्षित हूं। मुझे चिंता थी कि कहीं आप (सोनिया गांधी) संसद भवन में तो नहीं हैं। अपना ध्यान रखिएगा।

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सोनिया बोलीं- सरकार नेहरू को इतिहास से मिटाना चाहती है, उन्हें गलत तरीके से पेश किया जा रहा

कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी (CPP) की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ बयानबाजी को लेकर भाजपा सरकार की आलोचना की। सोनिया ने कहा- इसमें कोई शक नहीं है कि सरकार उन्हें (नेहरू को) सिर्फ इतिहास से मिटाना नहीं चाहती, बल्कि उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आधारों भी को कमजोर करना चाहती है, जिन पर देश खड़ा हुआ। पूरी खबर पढ़ें…

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