Gujarat Earthquake 2001: Chobari Village Ground Report

Gujarat Earthquake 2001: Chobari Village Ground Report


कच्छ (गुजरात)2 घंटे पहलेलेखक: सारथी एम सागर और हर्ष पटेल

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गुजरात के भुज में 26 जनवरी, 2001 की सुबह विनाशकारी भूकंप आया था। भूकंप का केंद्र चोबारी गांव था, जो भुज से करीब 100 किमी दूर है। चोबारी को कच्छ का आखिरी छोर भी कहा जाता है।

भुज में आए भयानक भूकंप के 25 साल पूरे होने पर भास्कर की टीम चोबारी गांव पहुंची। केंद्रबिंदु होने के कारण यहां के लोगों ने जिस तीव्रता और भयावहता का अनुभव किया, वह शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

25 साल पहले के उन अनुभवों को जानने के लिए हमने चोबारी के ग्रामीणों से बातचीत की। उस दिन लोगों ने क्या देखा? पढ़ें इस ग्राउंड रिपोर्ट में…

गांव के कुछ लोगों ने अपने ध्वस्त घरों को अब धर्मस्थल बना दिया है।

घर में पत्नी, 6 महीने की बेटी, मां और दादी थीं

सबसे पहले हमारी मुलाकात चोबारी के वेलजीभाई मेरिया से हुई। वेलजीभाई बताते हैं- उस समय घर में पत्नी, 6 महीने की बेटी, मां और दादी थीं। मैं बाहर था और मेरे तीन भाई-बहन खेत गए हुए थे।

जब मैं वापस लौटा, तो पूरा घर ध्वस्त हो चुका था। पूरा मकान जमीन के बराबर हो गया था। कुछ देर तक समझ ही नहीं आया कि क्या करूं। आसपास के लोग भी मदद के लिए पहुंचे और सभी ने मिलकर मलबे से लोगों को निकालने की कोशिश की।

मेरी मां और पत्नी के सिर में भी चोट लगी थी, किसी तरह उनकी जान बच गई। लेकिन, मेरी बच्ची और दादी की जान नहीं बच सकी। आज मेरी बेटी होती तो शादी की उम्र की हो गई होती।

हमारे ऊपर बाजरे के ढेर गिर गए थे, इसलिए जान बच गई: मजीबेन

इसके बाद भास्कर ने एक महिला मजीबेन से भी बात की। मजीबेन ने बताया- जिस दिन भूकंप आया, उस दिन हम घर पर ही थे। हमारे घर कच्चे थे। हम भी मलबे में दब गए थे, लेकिन हमारे ऊपर बाजरे के ढेर गिर गए थे, इसलिए जान बच गई। हालांकि पैर में बहुत चोट लगी थी, पैर टूट गया था। मेरे जेठ का इकलौता बेटा भी भूकंप में चला गया था।

गांव के सभी मकान ढह गए थे। जब नरेंद्र मोदी चोबारी में हमसे मिलने आए, तब हम झोपड़ियों में रह रहे थे। हमने उनसे कहा कि हमें कुछ मदद दीजिए। उन्होंने कहा कि सब कुछ ठीक कर देंगे। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने हमें पक्के घर बनवाकर दिए।

चोबारी गांव पहुंचे नरेंद्र मोदी ने मजीबेन से मुलाकात की थी।

भूकंप वाले दिन मैं पिता के साथ मुंबई में था, परिवार यहीं था: लालजीभाई

यहीं पर हमारी मुलाकात लालजीभाई से हुई। उन्होंने कहा- जिस दिन भूकंप आया, उस दिन हम मुंबई में थे। मेरी मां, चाचा और बहन यहां चोबारी में थे। हमें मुंबई में अगले दिन इस घटना की जानकारी मिली। यह सुनकर दिल हिल गया। मेरे पिता मुंबई से कच्छ के लिए निकल पड़े। दो-तीन दिन बाद वे भचाऊ पहुंचे और वहां से चोबारी आए।

लालजीभाई ने आगे बताया कि जहां हम आज खड़े हैं, वहां कभी एक समय पर घना बाजार हुआ करता था। आज यहां मैदान है। अब यहां सिर्फ पुराने मंदिर ही बचे हैं।

लालजीभाई के पिता विनोदभाई ने बताया- मैं मुंबई से यहां आया, तब पता चला कि पत्नी, मेरे भाई और उसकी पत्नी की भूकंप में मौत हो गई है। इस तरफ सारी दुकानें थीं और उनके पीछे मकान थे। हर जगह मलबे के ढेर लग गए थे। बाजार में मेरी दुकान थी। मेरे भाई की उसी दुकान के नीचे दबकर मौत हो गई थी।

लालजीभाई के साथ खड़े शिवगरभाई बावजी ने बताया- भूकंप के छह महीने बाद भी यहां से शव मिले थे। एक मेरा भतीजा था और दूसरा मेरे रिश्तेदार का साला। उनकी यहां होटल थी। उस समय मलबा इतना ज्यादा था कि लोगों को ढूंढ़ने में ही महीने भर का समय लग गया था। धीरे-धीरे जब मलबा हटाया जाने लगा, तब मेरे दोनों रिश्तेदारों के शव मिले। कपड़ों से उनकी पहचान हो पाई थी,क्योंकि शव कंकाल में तब्दील हो चुके थे।

नरेंद्र मोदी की सभा में भचुभाई अहीर (रेड सर्कल में)।

इसके बाद हमने उस भयानक भूकंप के प्रत्यक्षदर्शी भचुभाई आहिर से बातचीत की। भचुभाई बताते हैं- भूकंप इतना जबरदस्त था कि चोबारी स्कूल के बच्चे मलबे में दब गए थे। पीछे से दीवार गिर गई थी और दर्जनों बच्चे उसके नीचे दब गए। उनमें से कईयों की मौत हो गई थी।

मैंने ही गांव से कम से कम 140 शव बाहर निकाले थे। भचुभाई आगे बताते हैं- मेरे दो सगे भांजे भी भूकंप में मारे गए थे। वे हमें 14 दिन बाद मलबे से मिले। मलबा हटाने में समय लगा और फिर उन्हें ढूंढने में भी। उनके चेहरे पहचान में नहीं आ रहे थे। बाद में कपड़ों से उनकी पहचान हुई थी।

भचुभाई आगे बताते हैं- हमारी किराने की दुकान थी। दुकान में हम भगवान को प्रसाद चढ़ाते थे। हमारे सामने एक स्कूल था। स्कूल के एक शिक्षक हमारे यहां प्रसाद लेने आए थे। मैंने उनसे कहा कि अभी आप जाइए, मैं प्रसाद लेकर आता हूं। वे स्कूल में चले गए। उसी दौरान मेरा छोटा भाई दुकान में प्रसाद के लिए मिठाई निकाल रहा था, तभी एक जोरदार आवाज आई। सब कुछ हिलने लगा। मैंने भाई से कहा कि तुम सब बाहर निकल जाओ।

तभी रामाभाई नाम के काका बोले कि पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी हो रही है। मैंने कहा—यह गोलाबारी नहीं है… यह भूकंप है। भगवान का नाम लो। भचुभाई बताते हैं कि उनकी दुकान के पीछे एक गोदाम था, जहां उनकी पत्नी मौजूद थीं। वह भी मलबे में दब गई थीं। डीज़ल भरने वाले बैरल में उनका सिर फंस गया था। उनके दोनों हाथ टूट गए थे। बाद में सेना के कैंप में उनके हाथों का इलाज करवाया गया।”

चोबारी गांव में नरेंद्र मोदी लोगों को संबोधित करते हुए।

भूकंप का अनुमान या सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं: डॉ. देवांशु पंडित

यह तो थी चोबारी की कहानी… इसके बाद हमने CEPT यूनिवर्सिटी के स्ट्रक्चरल इंजीनियर डॉ. देवांशु पंडित से बातचीत की, ताकि यह समझा जा सके कि उस समय तकनीकी रूप से क्या हुआ था और उनके शोध का अनुभव क्या रहा।

CEPT यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी में सहायक प्रोफेसर डॉ. देवांशु पंडित ने बताया- 2001 में जब कच्छ में भूकंप आया, तो उसके अगले ही दिन सरकारी प्रशासन के साथ-साथ CEPT के स्ट्रक्चरल इंजीनियर भी काम में जुट गए थे। उस समय मैं भी उस टीम का हिस्सा था।

वे बताते हैं कि घटना के दूसरे ही दिन एक संयुक्त बैठक हुई थी। इस दौरान AUDA और अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की ओर से यह बात सामने आई कि हालात ऐसे थे कि कई इमारतें देखने में सुरक्षित लग रही थीं, लेकिन लोग उनमें जाने से डर रहे थे। रात के समय लोग कारों में और टेंट लगाकर रहने लगे थे।

ऐसी परिस्थितियों में देश और विदेश के विशेषज्ञों से भी संपर्क किया गया था। इसके बाद विशेषज्ञों और CEPT ने मिलकर एक डैमेज असेसमेंट मेथडोलॉजी विकसित की। सीनियर प्रोफेसर आरजे शाह ने सभी को ट्रेनिंग दी। इसके बाद टीमें बनाकर इमारतों का निरीक्षण किया जाने लगा।

इस दौरान इमारतों को G0 से G5 तक की श्रेणियों में विभाजित किया गया। यह कार्य लगभग डेढ़ से दो महीने तक चला। यह मॉडल इतना सफल रहा कि इसे पूरे गुजरात में लागू किया गया और इसी के आधार पर नीतिगत फैसले लिए गए।

डॉ. देवांशु पंडित ने बताया कि 2001 में जो भूकंप आया था, उसमें जमीन की संरचना में मौजूद एक विशेष फॉल्ट पहले छिपा हुआ था, जो उस समय सामने आ गया। उसके बारे में हमें पहले ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन यह बेहद एक्टिव फॉल्ट निकला। इसी कारण कुछ स्थानों पर जमीन का स्तर ऊपर उठ गया था।

डॉ. देवांशु पंडित के मुताबिक कच्छ क्षेत्र की टेक्टोनिक प्लेट्स और फॉल्ट्स फिलहाल स्टेबल हैं। भूगर्भीय संरचना के अनुसार यहां दबाव लगातार बन रहा है, लेकिन अब तक ऐसा कोई बदलाव नहीं आया है, जिसे असामान्य कहा जा सके। यह भी नहीं है कि यहां पहली बार कोई अभूतपूर्व घटना हो रही हो। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि दबाव बनने की प्रक्रिया लगातार जारी है। इसके चलते अब भी छोटे-मोटे झटके आते रहते हैं। जिनको रिकॉर्ड भी किया जा रहा है।

डॉ. पंडित बताते हैं कि जब भी भूकंप आता है, तो उसका मॉनिटरिंग किया जाता है। इसके बाद उसकी पूरी जानकारी का विश्लेषण किया जाता है। जैसे उसका एपिसेंटर कहां था, उसकी मैग्नीट्यूड कितनी थी, और उसका प्रभाव कितनी दूर तक महसूस हुआ। इससे भूगर्भीय समझ (Understanding of Geology) में काफी वृद्धि हुई है, लेकिन अभी भी हमारे पास ऐसी कोई प्रणाली नहीं है, जिससे पूर्ण नियंत्रण या सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सके।

वर्तमान में टेक्टोनिक प्लेट्स की स्थिति पर सवाल के जवाब में डॉ. देवांशु पंडित ने कहा- कच्छ से लेकर हिमालय तक की भूगर्भीय स्थिति लगभग समान है। हमारी प्लेट यूरेशियन या चाइनीज़ प्लेट का हिस्सा है। फिलहाल यहां दबाव बढ़ रहा है और इसी कारण बड़ी भूगर्भीय गतिविधियां देखने को मिल रही हैं।

उन्होंने साफ किया कि भूकंप का पूर्वानुमान लगाना बेहद कठिन है, क्योंकि भूकंप की गतिविधि सिर्फ कुछ सेकंड की होती है। इसलिए यह कहना संभव नहीं है कि दो महीने बाद, एक साल बाद या किसी खास तारीख पर किसी निश्चित स्थान पर इतनी तीव्रता का भूकंप आएगा।

अगर कच्छ क्षेत्र की बात करें, तो यहां का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है। लेकिन जब हम भूकंपों को देखते हैं, तो 1819 के आसपास आया भूकंप काफी हद तक 2001 के भूकंप से मिलता-जुलता माना जाता है। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लगभग हर 200 साल में ऐसी बड़ी घटना घटित होती है। हालांकि, यह बात पूरे विश्वास के साथ और निश्चित रूप से नहीं कही जा सकती।

हाल के समय में जिस तरह कच्छ और राजकोट में भूकंप के झटके महसूस किए जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या आने वाले समय में कच्छ में भी जापान की तरह कभी भी भूकंप आ सकता है? इस पर डॉ. देवांशु पंडित ने स्पष्ट किया कि ऐसा मानना गलत है।

उन्होंने बताया कि जापान, दक्षिण अमेरिका और न्यूज़ीलैंड जैसे देश ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में आते हैं। यह लगभग 40,000 किलोमीटर लंबी घोड़े की नाल (हॉर्स-शू शेप) जैसी एक भूकंपीय पट्टी है, जहां दुनिया के करीब 75 प्रतिशत ज्वालामुखी स्थित हैं। इसी वजह से वहां सबसे बड़े और खतरनाक भूकंप आते हैं। इसकी तुलना में भारत का विशेषकर कच्छ क्षेत्र काफी हद तक सुरक्षित है।

डॉ. देवांशु पंडित ने आगे कहा कि- 2001 की तुलना में आज हमारे पास तकनीक कहीं अधिक उन्नत है। इस क्षेत्र में हम पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुए हैं। उस समय की तुलना में आज डेटा कवरेज की क्षमता भी बहुत बढ़ गई है, जिससे हमें रोजाना सिस्मिक एक्टिविटी का डेटा मिल रहा है।

उन्होंने बताया कि इस डेटा के आधार पर अब माइक्रो-जोनेशन किया जा सकता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि अगर भूकंप आता है, तो उसका इमारतों पर कितना और कैसा प्रभाव पड़ेगा।

(स्टोरी इनपुट: कमल परमार)

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