National Seminar on Hindi and Indian Knowledge Tradition at Nalanda | नालंदा में हिंदी-भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय सेमिनार: देश-विदेश के विद्वानों ने लिया हिस्सा, कहा- तकनीक के बिना अधूरा है भाषा का विकास – Nalanda News

National Seminar on Hindi and Indian Knowledge Tradition at Nalanda | नालंदा में हिंदी-भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय सेमिनार: देश-विदेश के विद्वानों ने लिया हिस्सा, कहा- तकनीक के बिना अधूरा है भाषा का विकास – Nalanda News


दो दिवसीय कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ

नालंदा विश्वविद्यालय की धरती पर आज “भाषा और नालन्दा परम्परा- हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद में विविध संस्थाओं की भूमिका” विषय पर द्वि दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ हुआ। सुषमा स्वराज सभागृह में आयोजित इस उद्घाटन सत्र में देश-विदेश के विद्वा

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यह आयोजन महज एक अकादमिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जो कभी नालंदा से पूरे विश्व में फैली थी। आज जब हिंदी और भारतीय भाषाएं वैश्वीकरण और तकनीकी क्रांति के दौर में अपनी जगह तलाश रही हैं, तब यह सेमिनार एक समयोचित पहल के रूप में सामने आई है।

तकनीक के बिना अधूरा है भाषा का विकास

नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने अपने विषय-प्रवर्तन में हिंदी के सामने उपस्थित चुनौतियों और अवसरों की बेबाक चर्चा की। उन्होंने कहा कि हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए केवल भावनात्मक अपील काफी नहीं है। हमें तकनीकी एकीकरण, मजबूत अनुवाद तंत्र और समकालीन शब्दावली के विकास पर गंभीरता से काम करना होगा।

प्रो. चतुर्वेदी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों की संभावनाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये उपकरण भाषाओं के बीच सेतु का काम कर सकते हैं। उन्होंने अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को चुनौती मानते हुए अकादमिक संस्थानों और हिंदी सेवी संगठनों के बीच समन्वित प्रयासों की जरूरत पर बल दिया। कुलपति ने नालंदा विश्वविद्यालय को बहुभाषिक संवाद का केंद्र बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

दीप जलाकर कार्यक्रम का किया गया शुभारंभ।

भारतीय आत्मा का पुनरुत्थान

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक और पूर्व सांसद तरुण विजय ने अपने ओजस्वी संबोधन में भारत की सनातन चेतना और बौद्धिक पुनरुत्थान पर गहरे विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत की अविजय चेतना का हजार साल का अनुष्ठान आज भी जारी है। वैश्विक आक्रमणों के बावजूद भारतीय आत्मा ने खुद को पुर्नस्थापित किया है।

विविध विषयों पर गहन चर्चा

संगोष्ठी के प्रथम दिवस तीन महत्वपूर्ण सत्रों में विभाजित था। “भाषायी नवाचार और सम्पादकीय दृष्टि”, “नालंदा और साहित्यिक संस्कृति” व “भाषायी नवाचार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी अनुप्रयोग” विषयों पर देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इन सत्रों में हिंदी की समकालीन चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर खुलकर विचार-विमर्श हुआ।

दिन भर चले अकादमिक विमर्श के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आयोजित की गईं, जिन्होंने भारतीय भाषाओं और परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। इन प्रस्तुतियों ने इस बात को रेखांकित किया कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहक भी है।

विरासत और भविष्य का संगम

नालंदा जैसे ऐतिहासिक विरासत-स्थल पर इस सेमिनार का आयोजन प्रतीकात्मक महत्व रखता है। जहां कभी दुनिया भर से विद्यार्थी ज्ञान की खोज में आते थे, वहां आज फिर भाषा, संस्कृति और तकनीक के संगम पर विमर्श हो रहा है। यह आयोजन हिंदी को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी मजबूत करने का प्रयास है।



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