US India Tariff Rollback Update; Russia Crude Oil

US India Tariff Rollback Update; Russia Crude Oil


वॉशिंगटन डीसी37 मिनट पहले

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न्यूयॉर्क में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक समिट में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट। तस्वीर 3 दिसंबर 2025 की है।

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प सरकार भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ में से आधा टैरिफ हटाने पर विचार कर सकती है।

उन्होंने गुरुवार को अमेरिकी मीडिया वेबसाइट पॉलिटिको को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना काफी कम कर दिया है, इसलिए टैरिफ में राहत देने की गुंजाइश बन रही है।

बेसेंट ने इसे अमेरिका की बड़ी जीत बताया और कहा कि भारत पर लगाया गया 25% टैरिफ काफी असरदार रहा है और इसकी वजह से भारत की रूसी तेल खरीद घट गई है। उन्होंने कहा कि टैरिफ अभी भी लागू हैं, लेकिन अब इन्हें हटाने का रास्ता निकल सकता है।

अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत पर दो बार टैरिफ लगाया था। पहली बार 1 अगस्त को व्यापार घाटे को लेकर 25% टैरिफ लगाया गया। इसके बाद 27 अगस्त को रूस से तेल खरीदने की वजह से एक बार और 25% टैरिफ लगाया गया।

ट्रम्प ने पहली बार अप्रैल 2025 में दुनिया पर ग्लोबल टैरिफ लगाया था।

बेसेंट बोले- यूरोप भारत से तेल खरीद कर रूस की मदद कर रहा

बेसेंट ने यह भी कहा कि यूरोपीय देश भारत पर टैरिफ इसलिए नहीं लगा रहे हैं क्योंकि वे भारत के साथ बड़ा व्यापार समझौता करना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने यूरोप पर आरोप लगाया कि वह भारत से रिफाइंड तेल खरीदकर खुद ही रूस की मदद कर रहा है।

बेसेंट रूसी तेल खरीदने पर लगने वाले 500% टैरिफ प्रस्ताव पर बोल रहे थे। इसमें अमेरिका उन देशों पर 500% तक टैरिफ लगा जा सकता है, जो रुस का तेल खरीदते हैं।

बेसेंट ने कहा कि 500% टैक्स लगाने का प्रस्ताव सीनेटर ग्राहम ने सीनेट में रखा है। हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प को इसकी जरूरत नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास पहले से ही एक कानून (IEEPA) के तहत यह अधिकार है कि वे राष्ट्रीय आपात स्थिति का हवाला देकर दूसरे देशों पर भारी आर्थिक प्रतिबंध या टैक्स लगा सकते हैं।

अमेरिका रूसी तेल बिक्री रोककर पुतिन पर दबाव बढ़ाना चाह रहा

अमेरिका, पुतिन पर दबाव बढ़ाने के लिए भारत समेत कई देशों से कह रहा है कि वे रूस से तेल खरीद बंद करें। भारत ने इस दबाव को गलत और अनुचित बताया है और कहा है कि उसकी एनर्जी पॉलिसी देश के हितों के हिसाब से तय होती है।

पिछले हफ्ते दावोस में भी बेसेंट ने फॉक्स न्यूज से कहा था कि ट्रम्प के 25% टैरिफ लगाने के बाद भारत ने तेल की खरीद काफी कम कर दी थी और अब लगभग बंद कर दी है।

कुछ हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि भारत की कुछ निजी कंपनियों ने रूस से तेल इंपोर्ट कम किया है, लेकिन भारत सरकार का कहना है कि रूस से तेल की खरीद जारी है।

भारत रूसी तेल खरीदने के मामले में तीसरे नंबर पहुंचा

  • दिसंबर 2025 में भारत रूस से तेल खरीदने में तीसरे नंबर पर आ गया। तुर्किये दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया। तुर्किये ने 2.6 बिलियन यूरो का तेल खरीदा।
  • भारत ने दिसंबर में रूस से 2.3 बिलियन यूरो यानी लगभग 23,000 करोड़ रुपए का तेल खरीदा। नवंबर में भारत ने 3.3 बिलियन यूरो यानी करीब 34,700 करोड़ रुपए का तेल खरीदा था।
  • चीन अब भी सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, उसने दिसंबर में रूस से 6 बिलियन यूरो यानी करीब 63,100 करोड़ रुपए का तेल खरीदा।
  • भारत की खरीद कम होने की सबसे बड़ी वजह रिलायंस इंडस्ट्रीज रही। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी ने रूस से तेल खरीद करीब आधी कर दी।
  • पहले रिलायंस पूरी सप्लाई रूस की कंपनी रोसनेफ्ट से लेती थी। लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से अब कंपनियां रूस से तेल कम खरीद रही हैं।
  • रिलायंस के अलावा सरकारी तेल कंपनियों ने भी दिसंबर में रूस से तेल खरीद करीब 15% घटा दी।

यूक्रेन वॉर के बाद रूसी तेल का बड़ा खरीदार बना भारत

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत, रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता तेल खरीदने लगा था। युद्ध से पहले रूस से भारत का तेल आयात बहुत कम था, लेकिन बाद में यह तेजी से बढ़ा और भारत रूस का बड़ा खरीदार बन गया।

रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर 2025 में भारत का रूसी तेल आयात छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया था। उस महीने भारत ने रूस से 77 लाख टन तेल खरीदा था, जो कुल आयात का 35% से ज्यादा था।

लेकिन दिसंबर में रूस से भारत को तेल की सप्लाई तीन साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई। आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर में रूस से तेल आयात घटकर करीब 12.4 लाख बैरल प्रति दिन रह गया, जो दिसंबर 2022 के बाद सबसे कम है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुल आयात में जरूर कमी आई है, लेकिन सरकारी तेल कंपनियां अब भी रूस से तेल खरीद रही हैं। उन्होंने कहा कि मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, बल्कि तेल खरीद का तरीका बदला है।

रूस ने डिस्काउंट देना कम किया

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने 20-25 डॉलर प्रति बैरल सस्ता क्रूड ऑयल बेचना शुरू किया। तब अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल थी, ऐसे में ये छूट भारत के लिए किफायती थी।

हालांकि अब अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत 63 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। रूस ने भी अपनी छूट घटाकर 1.5 से 2 डॉलर प्रति बैरल कर दी है। इतनी कम रियायत में भारत को पहले जैसा फायदा नहीं मिल रहा, ऊपर से रूस से तेल लाने में शिपिंग और बीमा खर्च भी ज्यादा पड़ता है।

इसी वजह से भारत अब दोबारा सऊदी, UAE और अमेरिका जैसे स्थिर और भरोसेमंद सप्लायर्स से तेल खरीद रहा है, क्योंकि अब कीमत में पहले जैसा बड़ा अंतर नहीं बचा।

भारत कह चुका है अपने हित के मुताबिक फैसला लेंगे

भारत सरकार ने पहले भी कहा है कि वह सस्ता और भरोसेमंद तेल खरीदना जारी रखेगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और वित्त मंत्री ने साफ कहा है कि तेल कहां से खरीदना है, इसका फैसला देश के हित और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों के आधार पर किया जाएगा।

अमेरिका और भारत के बीच इस समय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। ऐसे में टैरिफ घटाने के संकेत दोनों देशों के रिश्तों में नरमी का संकेत माने जा रहे हैं।

रूस रुपए में भुगतान लेने को तैयार नहीं

पिछले दो साल में भारत ने रूस से बहुत ज्यादा क्रूड ऑयल खरीदा है। जबकि भारत ने रूस को काफी कम एक्सपोर्ट किया है। इस असंतुलन की वजह से रूस के पास काफी ज्यादा भारतीय रुपया जमा हो गया है।

रूस इसे आसानी से डॉलर में एक्सचेंज नहीं कर सकता है और न ही इसे बाकी देशों के साथ व्यापार में इस्तेमाल कर सकता है।

इसकी वजह ये है कि रुपया इंटरनेशनल लेवल पर अभी ऐसी करेंसी नहीं है जिसे दुनिया के ज्यादातर देश आसानी से स्वीकार कर लें या जिसे ग्लोबल मार्केट में आसानी से एक्सचेंज कर सकें। ऐसे मे रूस रुपए को कहीं इस्तेमाल नहीं कर पाता है। लिहाजा वो इसमें पेमेंट लेने से बचता है।

इसके अलावा रूस से सस्ता तेल खरीदने के बाद सबसे बड़ी परेशानी पेमेंट की आती है। अमेरिका और यूरोप ने रूस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बैंक रूस से जुड़े लेन-देन को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं। भारत जब रूस को पेमेंट भेजता है तो कई बार ट्रांजैक्शन रुक जाते हैं या मंजूरी देने में बहुत समय लगता है।

डॉलर में पेमेंट करने पर अमेरिकी दबाव और सैंक्शन का खतरा रहता है, इसलिए कई बार किसी तीसरे देश के बैंक के जरिए पैसा भेजना पड़ता है, जिससे प्रोसेस और उलझ जाता है। इन सब का असर भारतीय तेल कंपनियों पर पड़ता है। तेल भले सस्ता हो, लेकिन पेमेंट रुकने से शिपमेंट भी देर से पहुंचता है।

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