Bijapurs Sapna Korsa: Youngest Swimmer at KITG
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के पहले दिन छत्तीसगढ़ ने 2 मेडल अपने नाम किए थे। इनमें से एक सिल्वर और दूसरा ब्रॉन्ज था। सिल्वर 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में अनुष्का भगत ने जीता। वहीं ब्रॉन्ज सेम इवेंट, मेल कैटेगरी में निखिल ने दिलाया।
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इन 2 के अलावा छत्तीसगढ़ से स्विमिंग (फीमेल कैटेगरी) में एक और प्रतिभागी थी। इवेंट था 200 मीटर फ्री-स्टाइल और एथलीट थीं सपना कोर्सा। सपना मेडल तो नहीं दिला पाईं। बावजूद सबसे ज्यादा उनकी चर्चा हुई।
जब उन्होंने फिनिश किया, तो दर्शक दीर्घा में बैठै हर शख्स ने खड़े होकर तालियों के साथ उनका सम्मान किया। सपना महज 12 साल की हैं। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स (KITG) में सबसे कम उम्र की तैराक हैं। बीजापुर में रहती हैं। एक साल पहले ही स्विमिंग शुरू की और इस बार अपना पहला नेशनल खेला।
पिता किसान हैं। उनके इलाके में शहर जैसी सुविधा नहीं। जिस पुल में सपना प्रैक्टिस करती हैं, उसका आकार नेशनल-इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन स्टैंडर्ड के स्विमिंग पुल से आधा है। डाइट की भी समस्या रहती है। कोई स्पेसिफिक सेंटर नहीं हैं, जहां वो अभ्यास कर पाएं।
इन हालातों के बीच भी सपना ने नेशनल ट्राइबल गेम्स के लिए क्वालिफाई किया। अपने से 2 से 10 साल तक बड़े एथलीट्स से कम्पीट किया। यहां तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था। पढ़िए सपना और उनकी कोच दीप्ती वर्मा से खास बातचीत…
पहले देखिए ये तस्वीरें-
सिल्वर 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में अनुष्का भगत ने जीता।
सेम इवेंट, मेल कैटेगरी में निखिल ने ब्रॉन्ज दिलाया।
सपना मेडल तो नहीं दिला पाईं। बावजूद सबसे ज्यादा चर्चा उनकी हुई।
ढाई मिनट पीछे होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी
सबसे पहले ये बताते हैं कि सपना के लिए तालियां क्यों बजाई गई। दरअसल, इवेंट में सपना ने स्टार्ट तो अच्छा लिया। लेकिन फिर पिछड़ गईं। उनके साथ वाले सभी एथलीट्स ने 02 मिनट 39 सेकेंड से 02 मिनट 58 सेकेंड के बीच अपना इवेंट पूरा कर लिया।
लेकिन सपना की टाइमिंग थी, 4 मिनट 27 सेकेंड। अपने काम्पिटिसर्स के मुकाबले डेढ़ से ढाई मिनट पीछे। यानी इन डेढ़ से ढाई के बीच सपना अकेली थीं, जो 50 मीटर के पुल में स्विमिंग कर रही थीं। इन बीच के मिनट्स में दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों के बीच ये चर्चा भी शुरु हो गई थी कि सपना गिव-अप कर देंगी।
यानी फिनिश करने से पहले ही मुकाबला छोड़ देंगी। लेकिन सपना ने ऐसा नहीं किया। लोग एक टक गैलरी पर बैठे, यही देख रहे थे कि क्या सपना फिनिश कर पाएंगी। और जब सपना ने फिनिश किया, मौजूद लोगों ने खड़े होकर उनके लिए तालियां बजाईं।
सपना कहती हैं कि पिछड़ जाने के बाद उनका मुकाबला खुद से था। बीच में मुकाबला छोड़ देतीं तो वो खुद से भी हार जाती। सपना ने बताया- उनकी प्रैक्टिस नहीं हो पाई थीं, सही प्रैक्टिस होती तो वो मेडल लेकर आतीं।
सपना ने जब गेम खत्म किया तो सभी ने तालियों के साथ उसका सम्मान किया।
पिता किसान हैं, एक साल पहले ही स्विमिंग शुरू की
सपना के पिता किसान हैं। फाइनेंशियल मजबूती इतनी नहीं कि बाहर जाकर ट्रेनिंग ले पाए। पढ़ाई और ट्रेनिंग दोनों साथ में मैनेज करना भी मुश्किल होता है। पिछले साल समर क्लास के दौरान सपना पहली बार पुल में उतरीं। ये खेल उनको रास आया।
पिता से कहा कि वो स्विमनिंग में करियर बना चाहती हैं। फैमिली ने सपोर्ट किया। और खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में एक साल बाद ही उन्हें नेशनल खेलने का मौका दिया।
स्टैंडर्ड से आधे पुल में ली ट्रेनिंग
सपना ने बताया जिस पुल में ट्रेनिंग करती हैं, वो 25 मीटर ही लंबा है। इंटरनेशनल और नेशनल कॉम्पिटिशन जहां खेले जाते हैं, वो 50 मीटर लंबा होता है। आसान भाषा में समझा जाए तो 25 मीटर के स्विमिंग पुल में और इंटरनेशनल पुल में तैरने के एक्सपिरियंस में उतना ही अंतर है।
जितना सपना का अपने कॉम्पिटिटर्स से पिछड़ने का अंतर रहा। रायपुर का इंटरनेशल स्विमिंग पुल उन्होंने पहली दफा देखा। हालांकि, सपना बताती हैं कि गेम्स की तैयारियां चल रही थीं, तो उन्हें एंट्री नहीं मिली। ऐसे में यहां उन्हें प्रैक्टिस का मौका नहीं मिला। सिर्फ एक बार ही वो प्रैक्टिस कर पाईं थी।
कोच बोलीं- बच्चों में प्रतिभा बहुत, अगली बार मेडल जीतेंगे
सपना की कोच दीप्ति वर्मा बताती हैं कि सपना का पहला नेशनल है। एक्सपीरिंस के लिहाज से कंसीडर्ड करने को कहा है। हमारी कोशिश है कि वो डि-मोटिवेट न हो। मेडल जीतने के लिए अभी जो इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए वो हमारे पास नहीं है।
लोकल एडमिनिस्ट्रेशन प्रयास कर रहा है। लेकिन बहुत सुधार की उम्मीद बची हुई है। डाइट में हमें पोहा, केला मिलता है। जरूरत चिकन की है। इस तरह अभी हमारे पास कोई ऐकडमी भी नहीं, जहां बच्चे रहकर तैयारी कर सकें।
उम्मीद है कि ट्राइबल गेम्स के बाद खेल इंफ्रास्ट्रक्चर में और बेहतरी हो। साथ ही खिलाड़ियों को भी मिलने वाली सुविधाएं बढ़ें।

