चतरा में पेड़ों पर चढ़कर ‘नेटवर्क’ की तलाश:दर्जनों गांवों में नेटवर्क नहीं, पहाड़ चढ़ शिक्षक बनाते हैं अटेंडेंस, एंबुलेंस बुलाना भी मुश्किल

चतरा में पेड़ों पर चढ़कर ‘नेटवर्क’ की तलाश:दर्जनों गांवों में नेटवर्क नहीं, पहाड़ चढ़ शिक्षक बनाते हैं अटेंडेंस, एंबुलेंस बुलाना भी मुश्किल




झारखंड के चतरा जिले के सुदूरवर्ती इलाकों में आज भी मोबाइल नेटवर्क बड़ी है। डिजिटल इंडिया के दावों के बावजूद कुंदा, प्रतापपुर और लावालौंग प्रखंड के कई गांव बुनियादी संचार सुविधाओं से वंचित हैं। कुंदा प्रखंड के 78 गांवों में से करीब 30 गांव पूरी तरह डिजिटल ब्लैकआउट की स्थिति में है। इसी तरह प्रतापपुर के 148 गांवों में कुटिल, मरगड़ा, एकता, खुशियाला, लोटवा और दारी जैसे गांवों में नेटवर्क नदारद है। लावालौंग प्रखंड के 95 गांवों में से लगभग 20 गांवों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। इन इलाकों में रहने वाले बिरहोर, गंझू और भोक्ता जैसे आदिवासी समुदायों को संचार के लिए रोजाना संघर्ष करना पड़ता है। पेड़ों और पहाड़ों पर चढ़ तलाशते हैं नेटवर्क इन गांवों के लोगों की जिंदगी में मोबाइल नेटवर्क पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। ग्रामीणों को फोन पर बात करने या सिग्नल पाने के लिए ऊंचे पेड़ों या पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ना पड़ता है। कई बार घंटों तक हवा में मोबाइल लहराने के बाद भी सिग्नल नहीं मिलता। ग्रामीण राजदेव ने बताया कि अगर वे पेड़ पर नहीं चढ़ेंगे या गांव से दूर पहाड़ पर नहीं जाएंगे, तो किसी से बात करना संभव नहीं है। यह स्थिति आपसी बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि आपातकालीन सेवाओं को भी प्रभावित कर रही है। एम्बुलेंस बुलाने जैसी जरूरी सेवाओं के लिए भी लोगों को इसी तरह जूझना पड़ता है। स्कूलों में डिजिटल एजुकेशन हुआ ठप नेटवर्क की इस समस्या का सबसे अधिक असर शिक्षा व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है। प्रतापपुर प्रखंड के बामी गांव स्थित राजकीयकृत उत्क्रमित मध्य विद्यालय में डिजिटल क्लास की सुविधा पूरी तरह ठप है। सहायक शिक्षक शशि कुमार गुप्ता ने बताया कि उन्हें अपनी ऑनलाइन हाजिरी दर्ज करने के लिए स्कूल खत्म होने से पहले ही निकलकर पहाड़ पर जाना पड़ता है। अगर वहां सिग्नल मिल गया तो हाजिरी बन जाती है, अन्यथा गैरहाजिरी दर्ज हो जाती है। जंगल क्षेत्र में स्थित इस स्कूल में नेटवर्क बिल्कुल नहीं है, जिससे बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा देना भी संभव नहीं हो पा रहा है। विभागीय अधिकारियों के दौरे के दौरान भी संपर्क के अभाव में कई बार सूचनाएं समय पर नहीं मिल पातीं। टावर खड़े, लेकिन सेवा ठप; समाधान की उम्मीद विडंबना यह है कि इन क्षेत्रों में बीएसएनएल के टावर तो लगाए गए हैं, लेकिन वे अब तक चालू नहीं हो सके हैं और सिर्फ शोभा की वस्तु बने हुए हैं। वर्षों से यह स्थिति बनी हुई है, लेकिन न तो जनप्रतिनिधियों ने और न ही प्रशासन ने इस दिशा में ठोस पहल की है। इस संबंध में विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जंगली इलाकों में फ्रीक्वेंसी बैंड की तकनीकी समस्या है। बीएसएनएल चतरा के एसडीओ बालगोविंद पासवान ने कहा कि वर्तमान में 700 बैंड काम कर रहा है, जबकि 2100 बैंड लगाने से स्थिति सुधर सकती है। अधिकारियों का दावा है कि 4जी सैचुरेशन प्रोजेक्ट के तहत काम जारी है। जल्द ही नेटवर्क की समस्या दूर कर ली जाएगी। हालांकि ग्रामीणों का सब्र अब टूट रहा है। उनका कहना है कि मोबाइल रिचार्ज बेकार जा रहा है। जब तक इन इलाकों में नेटवर्क नहीं पहुंचेगा, तब तक डिजिटल इंडिया का सपना अधूरा ही रहेगा।



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