Iran US Peace Deal Details Explained; Donald Trump | Hormuz Strait

Iran US Peace Deal Details Explained; Donald Trump | Hormuz Strait


वॉशिंगटन डीसी1 मिनट पहले

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अमेरिका और ईरान ने जंग खत्म करने के समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने बुधवार देर रात डिजिटल हस्ताक्षर किए, जिसके साथ ही यह समझौता लागू हो गया।

इस डील से जुड़े एक अमेरिकी अधिकारी ने बुधवार को रिपोर्टरों के साथ हुई एक कॉन्फ्रेंस कॉल में 14 पॉइंट्स वाली डील की पूरी जानकारी दी है। 800 शब्दों वाले डेढ़ पन्ने के इस दस्तावेज में होर्मुज को सिर्फ 60 दिनों के लिए मुफ्त खोले जाने की बात कही गई है।

डील में ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने का भरोसा दिया है, जबकि ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर (28 लाख करोड़ रुपए) के फंड की योजना पर भी सहमति बनी है। अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर यह जानकारी दी।

ट्रम्प ने बुधवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बैठक के दौरान पेरिस के वर्साय पैलेस में इस दस्तावेज पर साइन किए।

पॉइंट-1: होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोला जाएगा

ईरान ने वादा किया है कि वह होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोल देगा। यह व्यवस्था 60 दिनों तक लागू रहेगी। इस दौरान जहाजों से एक्स्ट्रा टैक्स नहीं लिया जाएगा।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस समझौते की सबसे अहम लाइन है- सिर्फ 60 दिनों तक बिना किसी फीस के। इसका मतलब है कि 60 दिन पूरे होने के बाद ईरान जहाजों पर शुल्क या फीस लगा सकता है।

युद्ध से पहले ईरान आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय जहाजों से इस तरह का पैसा नहीं लेता था। अब टैक्स लगाने से वैश्विक समुद्री व्यापार की लागत बढ़ सकती है।

पॉइंट-2: अमेरिका समुद्री नाकेबंदी हटाएगा

ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिका नौसैनिक नाकेबंदी 30 दिन के भीतर पूरी तरह खत्म करेगा।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक नाकेबंद हटने से ईरान फिर से अपने बंदरगाहों से तेल और अन्य सामान खरीद-बेच सकेगा।

यह ईरान के लिए बहुत बड़ी और तत्काल राहत होगी, क्योंकि उसके ज्यादातर निर्यात चीन को जाते हैं। जैसे ही निर्यात दोबारा शुरू होगा, ईरान के पास विदेशी मुद्रा आनी शुरू हो जाएगी।

पॉइंट-3: ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा

समझौते में ईरान ने एक बार फिर भरोसा दिया है कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा।

दस्तावेज में कहा गया है कि ईरान के पास पहले से मौजूद संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) के भंडार का क्या किया जाएगा, इस पर दोनों देश मिलकर फैसला करेंगे। इसके लिए एक अलग व्यवस्था बनाई जाएगी, जिस पर आगे की बातचीत में सहमति बनेगी।

फिलहाल न्यूनतम सहमति यह है कि इस संवर्धित सामग्री को ईरान के भीतर ही इस तरह बदला जाएगा कि उससे परमाणु हथियार बनाना संभव न रहे। यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में होगी।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह समझौते का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि इसमें पहली बार सीधे ईरान के परमाणु कार्यक्रम की बात की गई है। यही मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और युद्ध की सबसे बड़ी वजह रहा है।

हालांकि इस पॉइंट में सबसे विवादित मुद्दों पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। दस्तावेज में ईरान ने फिर से कहा है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। ईरान 1970 में परमाणु अप्रसार संधि में शामिल होने के समय भी यही वादा कर चुका था। बाद में 2015 के परमाणु समझौते में भी उसने यही कहा था कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

समझौते में ईरान से कहा गया है कि वह अपने पास मौजूद लगभग 11 टन संवर्धित परमाणु सामग्री को कम घनत्व वाला बनाए। इसे डाउन-ब्लेंडिंग कहा जाता है। इसका मतलब है कि यूरेनियम को इतना पतला कर दिया जाए कि उसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में न हो सके।

इन 11 टन सामग्री में करीब 970 पाउंड ऐसा यूरेनियम भी शामिल है, जिसे 60% तक एनरिच्ड किया जा चुका है। यह स्तर परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी स्तर के काफी करीब माना जाता है।

लेकिन समझौते में यह नहीं कहा गया है कि ईरान को यह सामग्री देश से बाहर भेजनी होगी। ईरान लंबे समय से अपने यूरेनियम भंडार को विदेश भेजने का विरोध करता रहा है।

हालांकि 2015 के परमाणु समझौते में ईरान ने अपने उस समय के लगभग 97 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम भंडार को रूस भेज दिया था। यही कारण है कि अभी कई बड़े सवाल अनसुलझे हैं।

जैसे कि

क्या ईरान अपने पास संवर्धित यूरेनियम का भंडार रख पाएगा?

क्या उसे अपनी प्रमुख परमाणु सुविधाएं बंद करनी होंगी?

क्या उसे नया यूरेनियम संवर्धित करने की अनुमति मिलेगी?

या उसे 13 से 20 साल तक संवर्धन गतिविधियां रोकनी पड़ेंगी?

पॉइंट-4: ईरान को ₹28 लाख करोड़ का हर्जाना

अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर, यानी 28 लाख करोड़ रुपए की योजना तैयार करने का वादा किया है।

हालांकि, यह पैसा तुरंत नहीं दिया जाएगा। पहले अमेरिका और ईरान को 60 दिनों में अंतिम समझौते पर पहुंचना होगा। इससे ही तय होगा कि 300 अरब डॉलर का फंड कैसे बनाया जाएगा, पैसा कहां से आएगा और उसे किस तरह खर्च किया जाएगा।

राष्ट्रपति ट्रम्प पहले ही कह चुके हैं कि इस फंड में अमेरिका सीधे पैसा नहीं लगाएगा। हालांकि, उन्होंने यह संभावना जरूर खुली छोड़ी कि खाड़ी देश, जैसे सऊदी अरब, कतर और UAE इस फंड के लिए पैसा उपलब्ध करा सकते हैं।

पॉइंट-5: ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटेंगे

अमेरिका ने अंतिम समझौता होने पर ईरान पर लगे सभी तरह के प्रतिबंधों को एक-एक करके खत्म करने का वादा किया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक ईरान पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देना शायद वह सबसे बड़ा कदम है, जिसके बदले अमेरिका ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त सीमाएं स्वीकार करने के लिए राजी कर सकता है।

यही व्यवस्था 2015 के परमाणु समझौते में भी अपनाई गई थी। उस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे और बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली थी।

हालांकि उस समझौते में लगी पाबंदियों की अवधि अधिकतम 15 साल थी। लेकिन ट्रम्प का कहना है कि वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमेशा के लिए प्रतिबंध चाहते हैं।

अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि दोनों देश इस बात पर सहमत कैसे होते हैं कि कौन-कौन से प्रतिबंध हटाए जाएंगे और उन्हें किस समय हटाया जाएगा। साथ ही यह भी तय करना होगा कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के कौन-कौन से कदम कब उठाएगा।

पॉइंट-6: ईरानी तेल के निर्यात पर छूट

समझौते के मुताबिक, MoU पर दस्तखत होते ही अमेरिका ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उनसे जुड़े अन्य सामान के निर्यात पर राहत देना शुरू कर देगा।

इसके लिए अमेरिकी वित्त मंत्रालय जरूरी छूट और मंजूरियां जारी करेगा, ताकि ईरान अपना तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सके।

यह राहत सिर्फ तेल बेचने तक सीमित नहीं होगी। इसमें बैंकिंग लेन-देन, बीमा, जहाजरानी, माल ढुलाई और अन्य वित्तीय सेवाओं से जुड़ी बाधाओं को भी कम किया जाएगा, जो ईरान के तेल निर्यात में रुकावट बनती रही हैं।

यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक समझौते का यह हिस्सा ईरान के खिलाफ सख्त रुख रखने वाले नेताओं और विशेषज्ञों के बीच सबसे ज्यादा चिंता का कारण बना हुआ है। उनका मानना है कि तेल निर्यात पर लगी रोक अमेरिका का सबसे प्रभावी दबाव का साधन थी। इसी के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना हुआ था।

पॉइंट-7: ईरान की फ्रीज्ड संपत्तियां रिलीज होंगी

समझौते के तहत अमेरिका ने वादा किया है कि वह ईरान के उन धन और संपत्तियों को इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराएगा, जो अभी तक विभिन्न प्रतिबंधों के कारण फ्रीज्ड हैं या जिन पर रोक लगी हुई है।

हालांकि यह पैसा कब और किस प्रक्रिया के तहत जारी होगा, इसका तरीका अमेरिका और ईरान आपसी बातचीत के जरिए तय करेंगे।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इसका मतलब यह हो सकता है कि अंतिम समझौता होने का इंतजार किए बिना ही ईरान के लिए अरबों डॉलर की रकम जारी होना शुरू हो जाए। अनुमान है कि यह राशि 24 अरब डॉलर या उससे भी अधिक हो सकती है।

पॉइंट-8: एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे

अमेरिका-ईरान एक-दूसरे की आजादी, सीमाओं और संप्रभुता का सम्मान करेंगे। घरेलू मामलों में दखल नहीं देंगे।

समझौते का यह हिस्सा ईरान के सरकार विरोधी गुटों को पसंद नहीं आ सकता। इन्हें उम्मीद थी कि अमेरिका भविष्य में भी ईरान में राजनीतिक बदलाव या लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों का खुलकर समर्थन करेगा।

दरअसल, इसी साल ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा था कि उनकी मदद की जाएगी। लेकिन नए समझौते के मुताबिक माना जा रहा है कि ईरान के अंदरूनी मुद्दों को लेकर अमेरिका का रुख पहले की तुलना में नरम हुआ है।

फ्रांस में ट्रम्प के पीस डील पर साइन करने के बाद ईरानी राष्ट्रपति पजशकियान ने इस पर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दस्तखत किए। दस्तावेज पर नीचे की ओर पजशकियान और ट्रम्प, दोनों के हस्ताक्षर नजर आ रहे हैं।

पॉइंट-9: सभी मोर्चों पर संघर्ष खत्म होगा

अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देशों के बीच सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत और स्थायी रूप से बंद की जाएगी। इसमें लेबनान भी शामिल है।

अमेरिका के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है, क्योंकि ट्रम्प को चिंता थी कि हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई पीस डील को कमजोर कर सकती है।

पहला पॉइंट इजराइल के खिलाफ माना जा रहा है। इजराइल पहले ही कह चुका है कि वह अमेरिका-ईरान बातचीत में लेबनान को लेकर हुई किसी भी सहमति को नहीं मानेगा।

पॉइंट-10: दोनों पक्ष मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं करेंगे

समझौते में कहा गया है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौता नहीं हो जाता, तब तक दोनों पक्ष मौजूदा स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेंगे।

इसका मतलब है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अभी जिस स्तर पर चला रहा है, उससे आगे नहीं बढ़ाएगा। वह नए बड़े कदम नहीं उठाएगा और न ही अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार करेगा।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे बातचीत के लिए एक स्पष्ट शुरुआती स्थिति तय हो जाती है। इसका मकसद यह है कि अंतिम समझौता होने तक अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर अतिरिक्त दबाव डालकर नई रियायतें हासिल करने की कोशिश न करें।

यानी बातचीत के दौरान न तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा और न ही अमेरिका नए प्रतिबंध लगाएगा या क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य ताकत भेजेगा।

पॉइंट-11: दोनों देश मिलकर निगरानी व्यवस्था बनाएंगे

अमेरिका और ईरान मिलकर एक विशेष निगरानी व्यवस्था बनाएंगे, जो यह देखेगी कि MoU की सभी शर्तों का सही तरीके से पालन हो रहा है या नहीं।

यह सिस्टम इस बात की जांच करेगा कि:

ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े वादों का पालन कर रहा है या नहीं।

अमेरिका प्रतिबंधों में राहत और अन्य आर्थिक व राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को पूरा कर रहा है या नहीं।

दोनों पक्ष समझौते की समयसीमा और शर्तों का पालन कर रहे हैं या नहीं।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका यह तय करना चाहता है कि ईरान के हर वादे की स्वतंत्र रूप से जांच और पुष्टि की जा सके।

यानी केवल ईरान के वादे करना पर्याप्त नहीं होगा। अमेरिका चाहता है कि यह साबित भी किया जा सके कि ईरान वास्तव में अपने परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम के भंडार और अन्य प्रतिबद्धताओं से जुड़े समझौते का पालन कर रहा है।

पॉइंट-12: तुरंत सभी मुद्दों पर बातचीत शुरू नहीं होगी

सबसे पहले दोनों देशों को समझौते के कुछ अहम बिंदुओं को लागू करना होगा। इनमें युद्धविराम बनाए रखना, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना, नौसैनिक नाकेबंदी हटाना, तेल निर्यात पर राहत देना और ईरान की जमी हुई संपत्तियों तक पहुंच बहाल करना जैसे कदम शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक इससे पता चलता है कि आने वाले दौर की बातचीत का सबसे बड़ा और सबसे अहम विषय ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही होगा। परमाणु गतिविधियों की सीमा क्या होगी, एनरिच्ड यूरेनियम का क्या होगा, निरीक्षण व्यवस्था कैसी होगी और प्रतिबंध किस तरह हटाए जाएंगे, जैसे सवाल अभी पूरी तरह तय नहीं हुए हैं।

पॉइंट-13: 60 दिनों में अंतिम समझौते का टारगेट

अमेरिका-ईरान ने अधिकतम 60 दिनों में समझौता लागू करने का टारगेट रखा है। हालांकि, दोनों देश सहमति से इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि इतने कम समय में अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा। खासकर इसलिए क्योंकि ईरान के साथ पहले हुई परमाणु बातचीत में कई साल लग चुके हैं।

हालांकि, ट्रम्प सरकार ने जानबूझकर यह समय सीमा तय की है। अगर तय समय में यह समझौता हो जाता है, तो अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म इलेक्शन में राष्ट्रपति ट्रम्प को फायदा हो सकता है।

पॉइंट-14: अंतिम समझौते को UNSC मंजूरी देगी

जब अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौता हो जाएगा, तो उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दी जाएगी। इसका मतलब है कि अंतिम समझौता केवल अमेरिका और ईरान के बीच का राजनीतिक समझौता नहीं रहेगा, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता भी मिल जाएगी।

यदि सुरक्षा परिषद इस समझौते को मंजूरी देती है, तो इसके प्रावधानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की ताकत मिल जाएगी और दुनिया के अन्य देशों को भी उसका सम्मान करना होगा।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे समझौते को मजबूती मिलेगी, जैसा कि पिछले वर्ष गाजा से जुड़े समझौते के मामले में हुआ था, जिसे भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का समर्थन मिला था। हालांकि कई एक्सपर्ट्स को शक है कि यह चरण वास्तव में आएगा भी या नहीं।

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