गिरिडीह के हरिहरधाम में उमड़ा आस्था का सैलाब:शिवलिंग आकार का है 65 फीट ऊंचा मंदिर, बंगाल के जज ने कराई थी यहां प्राण-प्रतिष्ठा
सावन की तीसरी सोमवारी और नाग पंचमी के पावन अवसर पर बगोदर स्थित प्रसिद्ध हरिहरधाम शिव मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह मंदिर के पट खुलते ही दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं का बाबा भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचना शुरू हो गया। देखते ही देखते मंदिर परिसर भक्तों से गुलजार हो उठा। इस दौरान पूरा परिसर ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया और पूजा-अर्चना कर सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की। सावन की सोमवारी और नाग पंचमी एक साथ पड़ने के कारण मंदिर में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालु गंगाजल और जमुनिया नदी का जल लेकर बाबा भोलेनाथ का अभिषेक करने पहुंचे। बाबाधाम जाने वाले गेरुआ वस्त्रधारी कांवरियों ने भी हरिहरधाम पहुंचकर भगवान शिव को जल अर्पित किया। बढ़ती भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रबंधन ने सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर विशेष व्यवस्था की। मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जा रही है। प्रबंधन ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे पूजा के दौरान आभूषण पहनकर मंदिर नहीं आएं, क्योंकि भीड़ का फायदा उठाकर उचक्के आभूषणों पर हाथ साफ कर सकते हैं। शिवलिंग आकार का है 65 फीट ऊंचा मंदिर बगोदर मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित हरिहरधाम शिव मंदिर अपनी अनोखी स्थापत्य कला और धार्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है। करीब 65 फीट ऊंचा यह मंदिर दूर से शिवलिंग के आकार में दिखाई देता है। यही अनूठी बनावट इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है और श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करती है। मंदिर के चारों ओर नदी का प्रवाह और शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक एवं मानसिक शांति का अहसास कराता है। हरिहरधाम के निर्माण की कहानी भी काफी रोचक है। पश्चिम बंगाल निवासी बाबा अमरनाथ मुखोपाध्याय पेशे से जज थे। बाद में उन्होंने सांसारिक जीवन का मोह त्याग दिया और चारों धाम की पदयात्रा पर निकल पड़े। इसी दौरान उन्हें बगोदर का यह स्थान पसंद आया। स्थानीय लोगों के सहयोग से वर्ष 1988 में यहां मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई। मंदिर के संस्थापक बाबा अमरनाथ मुखोपाध्याय ने वर्ष 1991 में देह त्याग दिया, लेकिन उनके द्वारा स्थापित आस्था आज भी श्रद्धालुओं को हरिहरधाम से जोड़ रही है। मंदिर प्रबंधक भीम यादव के अनुसार, मंदिर की अनूठी बनावट इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। मंदिर बनने से पहले यह इलाका काफी वीरान था, लेकिन हरिहरधाम के निर्माण के बाद यहां धीरे-धीरे बाजार विकसित होता गया और क्षेत्र की पहचान भी बदल गई। सावन में बढ़ जाती है बाजार की रौनक हरिहरधाम केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। मंदिर परिसर में वर्षभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। सावन की सोमवारी, सावन पूर्णिमा और महाशिवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। इसके अलावा वाहन पूजा, रिंग सेरेमनी, मुंडन संस्कार और शादी-ब्याह जैसे आयोजनों के लिए भी बड़ी संख्या में लोग हरिहरधाम पहुंचते हैं। मंदिर के आसपास दर्जनों मैरेज हॉल, होटल और विभिन्न प्रकार की दुकानें संचालित हैं, जिनसे सैकड़ों परिवारों का रोजगार जुड़ा हुआ है। सावन के महीने में श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ का सीधा असर स्थानीय कारोबार पर भी पड़ता है। पूजा सामग्री, फूल-माला, प्रसाद, खाने-पीने की वस्तुओं और अन्य दुकानों पर भीड़ बढ़ने से कारोबार में तेजी आती है। शांत वातावरण, धार्मिक आस्था और अनोखी स्थापत्य कला के कारण हरिहरधाम सालभर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। वहीं, सावन की सोमवारी और नाग पंचमी के अवसर पर यहां उमड़ने वाली भीड़ इस धार्मिक स्थल की बढ़ती लोकप्रियता और लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।
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