किनौर में फुल्याच मेला शुरू:नाचते-गाते मंदिर पहुंचे भेड़पालक, लाए दुर्लभ ब्रह्म कमल, रतनजोत; इष्ट देवताओं के सानिध्य में मेला




हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले किन्नौर की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक ऐतिहासिक फुल्याच (उख्यांग) पर्व धूमधाम से शुरू हो गया है। पूरे जिले में मनाए जाने वाले इस पारंपरिक उत्सव की शुरुआत रूपी वैली से हुई है, जहां ग्रामीण आगामी 1 सितंबर तक अपनी पारंपरिक वेशभूषा और सदियों पुराने रीति-रिवाजों के साथ इस उत्सव को मनाएंगे। मेले के पहले दिन गुरुवार शाम ठीक 5 बजे ‘प्लीत’ और ‘बिरयांच’ कंडे (ऊंचे पहाड़ी घास के मैदान) से भेड़ पालक वापस लौटे। वे अपने साथ पहाड़ों से बेहद दुर्लभ ब्रह्मकमल और रतनजोत सहित कई अन्य पहाड़ी फूल लेकर आए हैं। इन फूलों से विशेष मालाएं तैयार की जाएंगी, जिन्हें क्षेत्र के आराध्य देव महादेव टेरस नारायण, सुरू टेरस नारायण और थंबा वीर को श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाएगा। पारंपरिक लोक नृत्यों से गूंजी रूपी वैली इस पावन पर्व का विधिवत शुभारंभ रूपी वैली के नारायण मंदिर ‘हुरुवा’ से हुआ। इस दौरान देवलुओं (देव-नाचियों) और स्थानीय ग्रामीणों ने पारंपरिक गीतों की धुनों पर थिरकते हुए “जूगयो उख्यांग हो ले रूपी महादेव टेरस नारायण” का जयघोष किया। इस उत्सव की खास बात यह रही कि शिमला के 15/20 क्षेत्र के देवता साहिब ‘टेरस नारायण सुरू’ और स्थानीय देवता ‘थंबावीर’ ने भी विशेष रूप से मेले में शिरकत की। कंडे से लौटे भेड़ पालकों का ग्रामीणों ने गर्मजोशी से स्वागत किया और उनके साथ झूमते हुए लोक नृत्य का आनंद लिया। बेटियों को मिलेगा देव-आशीर्वाद, 20 भादो से सांगला घाटी में मनेगा जश्न यह उत्सव महादेव मझगांव मंदिर में तीनों देवताओं की छत्रछाया में 1 सितंबर तक अनवरत चलेगा। इस दौरान क्षेत्र से बाहर ब्याही गई बेटियां (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘जाईयां’ कहा जाता है) विशेष रूप से मायके पहुंचकर देवताओं को भेंट अर्पित करेंगी और उनका आशीर्वाद लेंगी। इसके बाद, 20 भादो से यह पर्व किन्नौर के अन्य क्षेत्रों में भी शुरू हो जाएगा। सांगला घाटी के किल्बा, सापनी, बटूरी ब्रुआ, शौंग, चांसू, कामरू, सांगला, बटसेरी रकछम और छितकुल सहित जिले के तमाम गांवों में इस पर्व की धूम देखने को मिलेगी। आधुनिकता के दौर में संस्कृति का संरक्षण महादेव टेरस नारायण देवता के मुख्य कारिंदों और प्रबुद्ध जनों—मोतमीन करतार सिंह नेगी, खजांची मुकेश खोजान, माली किशोर नेगी, महेंद्र नेगी, मारकामदार रमेश चंद नेगी, भूपेंद्र सिंह नेगी, माथस वीरेंद्र नेगी, विपन नेगी, पुजारी हिरपाल नेगी और धर्मपाल नेगी ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस बार भी यह ऐतिहासिक पर्व पूरी आस्था के साथ मनाया जा रहा है। उन्होंने गर्व जताते हुए कहा कि आज के आधुनिकता के दौर में भी किन्नौर के ग्रामीणों ने अपनी इस समृद्ध और अनमोल देव-संस्कृति को पूरी तरह सहेज कर रखा है।



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