ISRO Vikram-1 Rocket Launch Video Update; Space Mission
23 मिनट पहले
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विक्रम-1 भारत का पहला रॉकेट है जो ऑर्बिट तक पहुंचने में कामयाब रहा है।
हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस ने शनिवार 18 जुलाई को भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया। यह टेस्ट पहले ही प्रयास में कामयाब रहा। विक्रम-1 को स्काईरूट ने ही तैयार किया और लॉन्चिंग भी खुद ही की। सिर्फ लॉन्चपैड इसरो का था।
इसे आंध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा में इसरो के सतीश धवन स्पेस सेंटर से दोपहर 12:05 बजे लॉन्च किया गया। पहले यह लॉन्चिंग 11:30 बजे होनी थी, लेकिन 5 मिनट पहले काउंटडाउन रोक दिया गया। कुछ देर बाद इसे दोबारा शुरू किया गया। पीएम मोदी ने स्काईरूट के फाउंडर पवन कुमार चंदना को फोन करके बधाई दी है।
कंपनी ने 2022 में विक्रम-एस सबऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था, जो 89.5 km की ऊंचाई तक गया था। अब विक्रम-1 450 km की पृथ्वी की सर्कुलर निचली कक्षा तक पहुंच गया है। इसे भारत के स्पेस सेक्टर के लिए बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।
खबर में आगे बढ़ने से पहले लॉन्च से जुड़ी 5 तस्वीरें…
स्काईरूट अपने पहले ही टेस्ट ऑर्बिट तक पहुंचने में कामयाब रही है।
लॉन्च सक्सेसफुल होने के बाद खुशी मनाते हुए।
लॉन्च की कामयाबी के बाद ताली बजाते स्काईरूट टीम के वैज्ञानिक।
ये लॉन्च श्रीहरिकोटा से किया गया है। इसलिए यहां इसरो के वैज्ञानिक भी मौजूद है।
लॉन्च की कामयाबी के बाद स्काईरूट के फाउंडर से पीएम मोदी ने फोन पर बात की और उन्हें बदाई दी।
सोने के कलाम, साराभाई और सीवी रमन भी भेजे गए
इस लॉन्चिंग को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया था। इसके तहत विक्रम-1 रॉकेट अपने साथ टेक्नोलॉजी से लेकर कला से जुड़े पेलोड्स अंतरिक्ष में भेजे गए:
कॉमर्शियल और टेक्नोलॉजी ये पेलोड्स भी भेजे गए
- ग्रह स्पेस का टेक्नोलॉजी पेलोड।
- कॉस्मोसर्व स्पेस का पेलोड।
- डीक्यूब्ड का स्पेस रिसर्च से जुड़ा पेलोड।
- खुद स्काईरूट एयरोस्पेस का अपना इन-हाउस स्कोप पेलोड।
18 कैरेट सोने से बना आर्ट पीस भी स्पेस में भेजा गया
कॉस्मोस डायमंड्स की कलाकृति “कॉस्मिक ब्लूम” और एक खास माइक्रो-आर्ट पीस भी रॉकेट में भेजा गया। यह माइक्रो-आर्ट पीस 18 कैरेट सोने से बना छोटा सा रॉकेट है। इस पर वैज्ञानिक सर सी वी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. कलाम की सूक्ष्म मूर्तियां उकेरी गई हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ से लिखा गया एक पोस्टकार्ड भी रॉकेट में भेजा गया, जिस पर ‘वंदे मातरम’ शब्द अंकित हैं।
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर में लॉन्चपैड-1 पर लॉन्चिंग के लिए तैयार स्काईरूट का विक्रम-1 रॉकेट।
हल्के कार्बन-कंपोजिट से बना है पूरा रॉकेट
विक्रम-1 पूरी तरह से हल्के और मजबूत कार्बन-कंपोजिट स्ट्रक्चर से बना पहला ऑर्बिटल रॉकेट है। कार्बन फाइबर स्टील की तुलना में पांच गुना हल्का होता है। इससे रॉकेट का वजन कम हो जाता है, जिससे इसकी ईंधन दक्षता बढ़ जाती है। रॉकेट को ऊर्जा देने के लिए इसमें तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल दिया गया है।
1. तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज:
इसे आप रॉकेट के नीचे लगे तीन बेहद ताकतवर ‘बूस्टर्स’ की तरह समझ सकते हैं, जिनमें ठोस ईंधन जैसे बारूद की तरह का ठोस केमिकल भरा होता है.
रॉकेट को जमीन से उठाकर आसमान की तरफ धकेलने के लिए शुरुआत में बहुत भारी ताकत की जरूरत होती है। ये तीनों सॉलिड स्टेज एक-एक करके जलते हैं और रॉकेट को शुरुआती धक्का देकर अंतरिक्ष की सीमा लो अर्थ ऑर्बिट के पास पहुंचा देते हैं।
2. लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल
यह रॉकेट के ऊपरी हिस्से में लगा एक बेहद बारीक और स्मार्ट तरल ईंधन वाला छोटा इंजन होता है। जब रॉकेट अंतरिक्ष में पहुंच जाता है, तो वहां ठोस ईंधन काम नहीं आता क्योंकि उसे अपनी मर्जी से ऑन या ऑफ नहीं किया जा सकता। यहां ‘लिक्विड मॉड्यूल’ काम आता है।
यह अंतरिक्ष में सैटेलाइट को सही दिशा देने, रॉकेट की रफ्तार कम-ज्यादा करने और सैटेलाइट को उसकी तय की गई कक्षा में ‘एडजस्ट’ यानी स्थापित करने का काम करता है।
अब 5 जरूरी सवालों के जवाब…
सवाल 1: ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ की शुरुआत कब और किस उद्देश्य से हुई थी?
जवाब: स्काईरूट की शुरुआत करीब 8 साल पहले 2018 में हुई थी। इसे शुरू करने का मुख्य उद्देश्य भारत में ही बेहद किफायती और भरोसेमंद रॉकेट्स का निर्माण करना है, ताकि दुनिया भर के सैटेलाइट ऑपरेटर्स को ऑन-डिमांड और बजट-फ्रेंडली लॉन्चिंग सॉल्यूशंस दिए जा सकें।
हाल ही में ये कंपनी देश की पहली स्पेस टेक यूनिकॉर्न बनी थी। यानी कंपनी की वैल्यूएशन 1 बिलियन डॉलर के पार पहुंच गई थी।
सवाल 2: इस रॉकेट का नाम ‘विक्रम-1’ क्यों रखा गया है और इसका क्या महत्व है?
जवाब: इस रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में ‘विक्रम-1’ रखा गया है। डॉ. साराभाई ने ही देश के स्पेस सेक्टर की मजबूत नींव रखी थी। स्काईरूट अपने सभी रॉकेट्स के नाम उनके सम्मान में इसी सीरीज पर रखती है। साल 2022 में लॉन्च किया गया पहला सबऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-एस’ भी इसी सम्मान श्रृंखला का हिस्सा था।
सवाल 3: इस लॉन्चिंग से भारत के स्पेस सेक्टर को क्या फायदे होंगे?
जवाब: यह लॉन्चिंग भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए गेम चेंजर हो सकती है:
- एकाधिकार खत्म होगा: अब तक सैटेलाइट लॉन्च करने का काम केवल सरकारी एजेंसी ‘इसरो’ ही करती थी, लेकिन अब प्राइवेट कंपनियां भी इसमें हिस्सेदार बन रही हैं।
- ग्लोबल बिजनेस: स्काईरूट जैसी घरेलू प्राइवेट कंपनियों के आने से विदेशी सैटेलाइट कंपनियों को भारत में बेहद सस्ते, भरोसेमंद और ऑन-डिमांड लॉन्चिंग विकल्प मिलेंगे।
- आर्थिक विकास: इससे देश की स्पेस इकोनॉमी मजबूत होगी। नए स्टार्टअप्स को बढ़ावा मिलेगा और स्पेस सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार के मौके पैदा होंगे।
सवाल 4: स्काईरूट के फाउंडर्स कौन हैं और उनका क्या कहना है?
जवाब: स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना पवन कुमार चंदना (फाउंडर और सीईओ) और नागा भरत डाका (को-फाउंडर और सीओओ) ने मिलकर की है।
सीईओ पवन कुमार चंदना ने कहा कि यह हमारी पहली टेस्ट फ्लाइट है और इससे हमें अंतरिक्ष की कक्षा में रॉकेट के व्यवहार का बेहद कीमती डेटा मिलेगा।
सीओओ नागा भरत डाका ने कहा कि हमारा और हमारी पूरी टीम का आठ वर्षों का कठोर प्रयास आज इस ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में साकार हो रहा है।
स्काईरूट की शुरुआत 2018 में पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी।
सवाल 5: साल 2022 में लॉन्च हुए ‘विक्रम-एस’ और इस नए ‘विक्रम-1’ रॉकेट में क्या अंतर है?
जवाब: इन दोनों रॉकेट्स में तकनीक और क्षमता के स्तर पर बड़ा अंतर है:
- विक्रम-एस: यह साल 2022 में लॉन्च हुआ देश का पहला प्राइवेट सबऑर्बिटल रॉकेट था। यह केवल 89.5 किमी की ऊंचाई तक गया और वापस आ गया। यह पृथ्वी की कक्षा के चक्कर लगाने के लिए नहीं बना था, केवल टेस्टिंग के लिए था।
- विक्रम-1: यह एक ‘ऑर्बिटल-क्लास’ रॉकेट है। इसका काम सैटेलाइट्स को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना है। यह 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाकर करीब 350 किलोग्राम वजनी पेलोड्स को कक्षा में स्थापित करने की ताकत रखता है।
विक्रम S और विक्रम-1 में अंतर
| विशेषता | विक्रम-एस (2022) | विक्रम-1 (2026) |
| मिशन का प्रकार | सबऑर्बिटल | ऑर्बिटल |
| अधिकतम ऊंचाई/कक्षा | 89.5 किलोमीटर | 450 किलोमीटर (LEO) |
| वजन क्षमता (पेलोड) | केवल टेस्ट पेलोड | 350 किलोग्राम तक |
| मुख्य संरचना | सिंगल-स्टेज | 3 सॉलिड स्टेज + लिक्विड मॉड्यूल |
| मटेरियल | सामान्य कंपोजिट | पूर्ण कार्बन-कंपोजिट |
नॉलेज पार्ट: क्या होता है लो अर्थ ऑर्बिट
यह पृथ्वी की सबसे निचली कक्षा होती है जो जमीन से लगभग 160 से 2,000 किमी की ऊंचाई पर स्थित होती है। ज्यादातर कॉमर्शियल और मौसम संबंधी सैटेलाइट इसी ऑर्बिट में चक्कर लगाते हैं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन भी इसी ऑर्बिट में 450 किमी की ऊंचाई पर स्थित है।
भारत में कितनी प्राइवेट स्पेस कंपनियां हैं?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप रजिस्टर्ड हैं। इनमें सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल, प्रोपल्शन, स्पेस डेटा, ग्राउंड सिस्टम और डिफेंस-स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम करने वाली कंपनियां शामिल हैं। 2014 में सिर्फ 1 प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप था।

