Mussoorie Mazaar Demolished | Attackers Claim Religion First, Law Later; Hindu Leader Apologizes
मसूरी में स्थित बाबा बुल्लेशाह की मजार।
24 जनवरी की शाम मसूरी में सूफी कवि बाबा बुल्लेशाह की मजार को जय श्री राम के नारे लगाते हुए हथौड़ों से तोड़ दिया गया। घटना का वीडियो सामने आते ही यह मामला सिर्फ तोड़फोड़ तक सीमित नहीं रहा। मजार समिति और स्थानीय लोग इसे आस्था पर हमला बता रहे हैं, जबकि
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मजार समिति की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज किया है, लेकिन हमले के बाद जिस तरह के बयान सामने आए, उसने मसूरी जैसे शांत पर्यटन शहर में तनाव की लकीर खींच दी। एक ओर मजार को 100 साल पुरानी साझा विरासत बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे अवैध धार्मिक संरचना कहकर हथौड़ा चलाने वालों को ‘नमन’ किया जा रहा है।
तीन दिन बाद, 27 जनवरी की सुबह जब दैनिक भास्कर की टीम वाइनबर्ग एस्टेट पहुंची, तो मजार एक ‘क्राइम सीन’ में तब्दील हो चुकी थी। अंदर जाने पर रोक थी, चारों ओर पुलिस तैनात थी और जिस जगह पर कभी अगरबत्तियों की खुशबू और मन्नतों के धागे नजर आते थे, वहां टूटे पत्थर, बिखरा मलबा और सन्नाटा पसरा हुआ था।
मजार में जाने के लिए बनी सीढ़ियां।
शांत फिजाओं में पसरी मनहूस खामोशी
मसूरी की फिजाओं में आम तौर पर माल रोड की चहल-पहल, पर्यटकों की हंसी और ठंडी हवाओं का सुकून भरा शोर होता है। लेकिन जब हम मसूरी-धनौल्टी रोड स्थित वाइनबर्ग इस्टेट के घने जंगलों में पहुंचे, तो यहां एक अजीब सी, मनहूस खामोशी पसरी मिली।
यह खामोशी उस शांति की नहीं है जो पहाड़ों को सुकून देती है, बल्कि यह उस गहरे तनाव की है जो 24 जनवरी की शाम यहां बरपाए गए कहर के बाद उपजी है। मैं मुख्य रास्ते पर खड़ा हूं। यहां से जंगल के बीच एक पगडंडीनुमा रास्ता नीचे की ओर जाता है। यह वही रास्ता है जो पिछले 100 वर्षों से सूफी संत बाबा बुल्ले शाह की मजार तक जाता रहा है। वही मजार, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई-बिना किसी भेद के अपनी मन्नतों के धागे बांधने आते थे। हालांकि आज कहानी अलग है।
मजार के पास लोग मन्नते मांगते हुए हरे और नीले रंग की ये चुन्नियां बांधते थे।
मजार बनी ‘क्राइम सीन’
जैसे ही मैं मुख्य सड़क से नीचे उतरता हूं, रास्ते के किनारे लगी पुरानी लोहे की रेलिंग दिखाई देती है। इस रेलिंग पर सैकड़ों रंग-बिरंगे कपड़े बंधे हैं, ये वो मन्नतें हैं जो लोगों ने कभी यहां उम्मीद के साथ मांगी होंगी। हवा में उड़ते ये कपड़े आज बेबस नजर आते हैं, जैसे मूक गवाह हों उस नफरत के, जिसने उनकी पवित्रता को तार-तार कर दिया।
ठीक बगल में मजार का एक साइनबोर्ड लगा है। यह अब जर्जर हालत में है, मानो आने वाले खतरे की गवाही पहले ही दे रहा हो। सीढ़ियों से नीचे उतरते ही सामने का मंजर दिल को दहला देने वाला है। एक मजार, जो कभी ‘सर्वधर्म समभाव’ और आस्था का केंद्र थी, आज एक ‘क्राइम सीन’ में तब्दील हो चुकी है।
मजार के पास तैनात पुलिसकर्मी।
अंदर जाने की मनाही, बाहर पुलिस का पहरा
मजार के चारों ओर चार पुलिसकर्मी पूरी मुस्तैदी से अपनी राइफलों के साथ बैठे हैं। उनकी उपस्थिति बता रही है कि स्थिति सामान्य नहीं है। मैंने मजार के करीब जाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने रोक दिया। उन्होंने कहा “प्रशासन ने हमें यहां सुरक्षा के लिए तैनात किया है। फिलहाल, किसी को भी मजार के अंदर जाने की अनुमति नहीं है।
लेकिन बाहर से जो दिख रहा है, वह विचलित करने वाला है:
- टूटे हुए कांच: मजार के चारों तरफ जमीन पर कांच के बारीक टुकड़े बिखरे पड़े हैं।
- हथौड़ों के निशान: दीवारें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। उन पर हथौड़ों और लोहे की रॉड के गहरे निशान साफ देखे जा सकते हैं।
- बिखरा हुआ सामान: खिड़कियों के कांच टूट चुके हैं। अंदर झांकने पर दिखता है कि वहां रखा सामान—प्रसाद के डिब्बे, पवित्र चादरें और धार्मिक ग्रंथ—बेतरतीब ढंग से जमीन पर बिखरे पड़े हैं।
- ध्वस्त पवित्रता: यह वही जगह है जहां कुछ दिन पहले तक अगरबत्तियों की खुशबू और प्रार्थनाओं की गूंज होती थी, आज वहां विध्वंस का मलबा है।
जंगल की हवाओं में एक सिहरन है, जो जनवरी की ठंड से ज्यादा उस डर की वजह से है जो 24 जनवरी की शाम यहां हुआ था।
मजार परिसर में पड़े टूटे कांच।
24 को मजार पर चला हथौड़ा
24 जनवरी की देर शाम, जब मसूरी के पर्यटक मौसम का आनंद ले रहे थे और शहर अपनी रफ्तार में था, वाइनबर्ग एस्टेट के सन्नाटे में कुछ और ही घट रहा था।
चश्मदीदों और पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 25 से 30 लोग अचानक वहां पहुंचे। उनके हाथों में हथौड़े, लोहे की रॉड और लाठियां थीं। उन्होंने आते ही मजार पर धावा बोल दिया।
- धार्मिक ग्रंथों का अपमान: आरोप है कि भीड़ ने वहां रखे पवित्र धार्मिक ग्रंथों को फाड़ा और क्षतिग्रस्त किया।
- गंदगी फैलाई: सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आरोप यह है कि हमलावरों ने मजार की पवित्रता भंग करने के लिए वहां शौच भी किया।
- भीड़ का उन्माद: मजार के ढांचे को पूरी तरह से तोड़ने की कोशिश की गई।
पुलिस ने इस मामले में तत्काल कार्रवाई करते हुए 3 नामजद और 25-30 अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 (1)(b) (धर्म के आधार पर शत्रुता को बढ़ावा देना) और 298 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) के तहत एफआईआर दर्ज की है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह सब क्यों हुआ? कौन थे ये लोग? और मसूरी जैसे शांत शहर में, जहां सभी धर्मों के लोग पीढ़ियों से मिलजुल कर रहते हैं, वहां ऐसी नफरत की आग किसने लगाई? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमने घटना के तीनों प्रमुख पक्षों से बात की।
जूते पहन मजार के ऊपर चढ़ा युवक मजार तोड़ता हुआ।
“कानून दूसरे नंबर पर, धर्म पहले”
इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी ‘हिन्दू रक्षा दल’ ने ली है। हमने संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा से सीधी बात की। अपनी कार्रवाई को लेकर वे न केवल बेखौफ हैं, बल्कि इसे गर्व से ‘धर्म युद्ध’ का नाम दे रहे हैं। उनकी बातों में कानून का डर रत्ती भर भी नहीं दिखा, बल्कि अपने मिशन का उन्माद ज्यादा नजर आया। उन्होंने इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए कहा, यह हमारे कार्यकर्ताओं ने देवभूमि की रक्षा के लिए किया है। देवभूमि (उत्तराखंड) में कोई भी मजार या मस्जिद नहीं रहनी चाहिए। मेरे कार्यकर्ताओं ने जो किया, वह उनके ‘मन की आवाज’ थी।” उन्होंने कहा, प्रशासन को हमने बताया था कि हम तोड़ेंगे। लेकिन कार्यकर्ताओं ने समय से पहले ही जाकर तोड़ दी। मुस्लिम पक्ष कह रहा है कि हमने लूट की, लेकिन जो लोग मुंह पर कपड़ा बांधकर जाते हैं, वो लूट करने नहीं, सनातन को जगाने जाते हैं।”
आरोपियों को योद्धा बताते हिंदू रक्षा दल के प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा।
सबसे चौंकाने वाला बयान: कानून बनाम धर्म जब हमने उनसे पूछा कि क्या यह कार्रवाई कानून का उल्लंघन नहीं है, तो उनका जवाब किसी को भी स्तब्ध कर सकता है। ललित शर्मा ने कहा, “कानून मेरे लिए दूसरे नंबर पर आता है, पहले मेरा धर्म आता है। अगर कानून से भगवान श्रीकृष्ण चलते, तो महाभारत में जीत पांडवों की न होती। अगर कानून से प्रभु श्रीराम चलते, तो सीता माता वापस न आतीं। धर्म के लिए कानून तोड़ना पड़ेगा।”
वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने आगे जोड़ा, “जब मेरा सोमनाथ मंदिर लूटा गया, नालंदा जलाया गया, कश्मीर में मेरे भाई मारे गए… तब कानून कहां था? जहां मेरा धर्म बचना होगा, मैं कानून का उल्लंघन करूंगा।” ललित शर्मा ने स्कूल प्रशासन और स्थानीय लोगों को खुली चेतावनी दी है कि, अगर दोबारा वहां मजार बनाने की कोशिश की गई, तो वहां एक भव्य राम मंदिर बनेगा। हिंदू रक्षा दल का हथौड़ा तैयार है।”
“मैं सनातनी हूं, पर आज शर्मिंदा हूं”
ललित शर्मा के दावों के ठीक विपरीत, सईद बाबा बुल्ले शाह मजार समिति के अध्यक्ष रजत अग्रवाल की बातें एक अलग ही तस्वीर पेश करती हैं। दिलचस्प बात यह है कि रजत अग्रवाल खुद एक गर्वित हिंदू हैं और मसूरी व्यापार मंडल के अध्यक्ष भी हैं। लेकिन वे इस घटना से बेहद आहत हैं।
प्रशासन की ‘क्लीन चिट’
रजत ने खुलासा किया कि कुछ समय पहले भी एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें इसे ‘वन भूमि पर कब्जा’ बताया गया था। “इसके बाद प्रशासन, नगर पालिका और फॉरेस्ट विभाग ने एक हफ्ते तक संयुक्त कार्रवाई और दस्तावेजों की जांच की थी। जांच में पाया गया कि यह मजार स्कूल की निजी भूमि पर है और किसी भी तरह का अवैध अतिक्रमण नहीं है। स्कूल के पुराने कर्मचारियों ने कभी इसे बनाया होगा, और धीरे-धीरे लोगों की आस्था बढ़ती गई।”
प्रशासन का ‘विश्वासघात’
घटना वाले दिन का जिक्र करते हुए रजत अग्रवाल का दर्द छलक पड़ता है। “शनिवार सुबह (घटना वाले दिन) मजार की देखभाल करने वाली महिला के बेटे दीपक का मुझे फोन आया। उसे डर था कि कोई मजार तोड़ने आ सकता है। मैंने तुरंत एसडीएम साहब से बात की। उन्होंने मुझे लिखित में वॉट्सऐप किया- ‘आप चिंता न करें, हम कुछ नहीं होने देंगे।’ मुझे लगा प्रशासन मुस्तैद है। लेकिन शाम को जो हुआ, उसने हमें शर्मिंदा कर दिया।”
“मेरे मुस्लिम भाइयों से नजर नहीं मिला पा रहा” रजत कहते हैं, “जिन लोगों ने यह हमला किया, वे बाहर के थे (देहरादून के)। उन्होंने पवित्र कुरान फाड़ डाली। यह धर्म का काम नहीं है। एक समिति अध्यक्ष होने के नाते मुझे आश्चर्य है और मैं शर्मिंदा हूं। मेरे मुस्लिम भाइयों ने मुझे फोन करके कहा- ‘अगर हम आपके मंदिर के साथ ऐसा करते तो क्या होता?’ मेरे पास कोई जवाब नहीं था।”
नौकरों की कब्र कैसे बनी बुल्लेशाह की मजार?
भास्कर ने इस मजार के इतिहास को खंगालने के लिए वाइनबर्ग एलन स्कूल के बर्सर (बिजनेस मैनेजर) आईएएन चौहान से बात की। उन्होंने ऑफ-कैमरा जो जानकारी दी, वह इस जगह के ऐतिहासिक महत्व को बताती है।
- अफगान कनेक्शन: चौहान बताते हैं कि यह मजार स्कूल बनने (1966 में जमीन खरीदने) से बहुत पहले की है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इस क्षेत्र (बाला हिंसोर) में एक जेल हुआ करती थी।
- दोस्त मोहम्मद आमिर की कैद: अफगानिस्तान के दोस्त मोहम्मद आमिर यहां बंदी थे। उसी दौरान उनके दो नौकरों की मौत हो गई थी।
- कब्रिस्तान बना: उन नौकरों को इसी वाइनबर्ग स्टेट की जमीन पर दफनाया गया। इसके बाद और भी करीब छह कब्र वहां बन गईं।
- श्रद्धा और नाम: धीरे–धीरे लोग उस जमीन पर जाने लगे। स्कूल प्रशासन ने जब तार-बाड़ कराई, तो लोगों ने अपनी मान्यताओं के अनुसार इसे बाबा बुल्लेशाह की मजार का नाम दे दिया।
1888 में स्थापित मसूरी का वाइनबर्ग एलन स्कूल।
मुरादें पूरी होने का विश्वास
स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। खुद रजत अग्रवाल कहते हैं कि उनकी भी मन्नत पूरी हुई थी। पिछले 44 साल से यहां हर साल अक्टूबर में उर्स का आयोजन होता है, जिसमें 1 से 1.5 लाख रुपए दान आता है, जो मजार के रख-रखाव में खर्च होता है।
कौन थे बुल्लेशाह? जिनका जनाजा पढ़ाने से मौलवियों ने कर दिया था मना
विडंबना देखिए, जिस बुल्लेशाह की मजार को ‘कट्टरता’ के नाम पर तोड़ा गया, वे खुद जीवन भर धार्मिक कट्टरता के सबसे बड़े विरोधी रहे।
- असली नाम: अब्दुल्ला शाह (जन्म: 1680 ई., पाकिस्तान)।
- विद्रोही विचार: वे एक प्रतिष्ठित ‘सैयद’ परिवार से थे, लेकिन उन्होंने एक ‘आराईं’ (माली/सब्जी उगाने वाले) शाह इनायत कादरी को अपना गुरु बनाया। उस दौर में एक ऊंची जाति वाले का नीची जाति वाले के पैरों में गिरना बहुत बड़ा विद्रोह था।
- न मस्जिद, न मंदिर: बुल्लेशाह ने लिखा था— “मस्जिद ढहा दे, मंदिर ढहा दे… पर किसी का दिल न ढहा, क्योंकि रब दिलों में रहता है।”
- मौत पर विवाद: वे मुल्लाओं और काजियों की आंखों में इतना खटकते थे कि 1757 में उनकी मौत पर शहर के मौलवियों ने उनका जनाजा (नमाज-ए-जनाजा) पढ़ाने से मना कर दिया था। उन्हें शहर के बाहर दफनाया गया था।
आज 300 साल बाद, मसूरी में उसी इतिहास को दोहराया गया है। तब मौलवियों ने उन्हें अपनाया नहीं था, आज ‘धर्म रक्षकों’ ने उन्हें तोड़ दिया।
इंटरनेट से ली गई बुल्लेशाह की तस्वीर।
“संविधान पर भरोसा, पर इंसाफ चाहिए”
मसूरी में मुस्लिम समुदाय की आबादी कम है (करीब 2000-2500), लेकिन उनका दर्द गहरा है। मुस्लिम सेवा संगठन के अध्यक्ष दानिश खान के चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि मायूसी है।
दानिश बताते हैं, “यह मजार सिर्फ मुसलमानों की नहीं थी। यहां के खादिम (सेवादार) भी हिंदू हैं। हमारे अध्यक्ष रजत भाई हिंदू हैं। बचपन से हम यहां भंडारा खाते आए हैं। कभी कोई दिक्कत नहीं हुई।”
“बाहरी लोगों ने बिगाड़ा माहौल”
दानिश का स्पष्ट मानना है कि मसूरी का माहौल बिगाड़ने की कोशिश ‘बाहरी लोगों’ द्वारा की जा रही है। “जिन लोगों ने मजार खंडित की, वे देहरादून से आए थे। उन्होंने हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाई, लेकिन हमें कानून पर पूरा भरोसा है। हमने तहरीर दी है।”
दो विचारधाराओं के बीच फंसा मसूरी
मसूरी के वाइनबर्ग इस्टेट में टूटे हुए कांच के टुकड़े सिर्फ एक इमारत के टूटने की गवाही नहीं दे रहे, बल्कि यह एक भरोसे के टूटने की कहानी है।
एक तरफ ललित शर्मा और उनका संगठन है, जो ‘धर्म की रक्षा’ के नाम पर कानून को गौण मानता है और ऐतिहासिक मजारों को ‘लैंड जिहाद’ के चश्मे से देखता है। उनका हथौड़ा और चेतावनी स्पष्ट करती है कि यह अंत नहीं, शुरुआत हो सकती है।
दूसरी तरफ रजत अग्रवाल और दानिश खान जैसे स्थानीय लोग हैं एक हिंदू, एक मुस्लिम जो मसूरी की साझा विरासत को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। रजत अग्रवाल का मजार के लिए लड़ना और दानिश खान का कानून पर भरोसा जताना, यह साबित करता है कि मसूरी की मूल आत्मा अभी भी आपसी भाईचारे में जिंदा है।
हथौड़ों से मजार को तोड़ते युवक।
कुछ सवाल जिनके नहीं मिले अभी जवाब
- आश्वासन देने के बावजूद प्रशासन मजार को क्यों नहीं बचा पाया?
- क्या ‘निजी भूमि’ पर स्थित 100 साल पुरानी विरासत को दोबारा सम्मान मिल पाएगा?
- या फिर ‘भव्य राम मंदिर’ की चेतावनी के बीच ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी का शांत वातावरण हमेशा के लिए बदल जाएगा?
फिलहाल, मजार के बाहर तैनात पुलिस और अंदर पसरा सन्नाटा यही बता रहा है कि तूफान अभी थमा नहीं है। एसपी सिटी प्रमोद कुमार का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जांच जारी है, लेकिन क्या यह जांच टूटी हुई आस्था को जोड़ पाएगी? यह भविष्य के गर्भ में है। —————— ये खबर भी पढ़ें… देहरादून से मसूरी 20 मिनट में पहुंचेंगे टूरिस्ट:जाम के झंझट से मिलेगा छुटकारा, फ्रांस की टेक्नोलॉजी से तैयार हो रहा रोपवे
पहाड़ों की रानी कहे जाने वाले उत्तराखंड के मशहूर टूरिस्ट डेस्टिनेशन मसूरी का सफर अब देहरादून से मात्र 20 मिनट में पूरा हो जाएगा। उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड (UTDB) टूरिस्टों की सुविधा के लिए देहरादून से मसूरी के बीच फ्रांस की टेक्नोलॉजी पर आधारित ऑटोमैटिक रोपवे का निर्माण करा रहा है। (पढ़ें पूरी खबर)

