Trump-Xi Jinping Meeting Agenda; Tariff Trade Rare Earths AI Race
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से तीखी बहस, जापान की पीएम को नीचा दिखाना, भारत के पीएम को टैरिफ की चेतावनी… अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ज्यादातर विदेशी नेताओं के साथ अपमानजनक तरीके से पेश आते रहे। लेकिन चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के दौरे से पहले
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जिनपिंग के लिए रेड कार्पेट कैसे बिछा रहे ट्रम्प, चीन को खुश करने के पीछे क्या कोई खास मकसद और इस दौरे का दुनिया पर असर क्या पड़ेगा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: अमेरिका की जमीन पर जिनपिंग के स्वागत में क्या-क्या होगा?
जवाब: शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका पहुंच रहे हैं। भारतीय समय के मुताबिक 23-24 सितंबर की रात 1 बजे के बाद उनका विमान वॉशिंगटन डीसी के जॉइंट बेस एंड्रयूज पर लैंड करेगा। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक…
- राष्ट्रपति ट्रम्प प्रोटोकॉल तोड़कर जिनपिंग का स्वागत करने एयरपोर्ट जाएंगे। किसी विदेशी नेता के स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का एयरपोर्ट जाना बेहद दुर्लभ। अगस्त 2025 में ट्रम्प ने अलास्का में रूसी राष्ट्रपति पुतिन का एयरफील्ड पर स्वागत किया था। हालांकि वो न्यूट्रल वेन्यू हुई स्पेशल मीटिंग थी, कोई स्टेट विजिट नहीं।
- अगले दिन, यानी 24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति के घर व्हाइट हाउस में जिनपिंग का स्वागत होगा। उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाएगी और अमेरिकी सेना के 479 जवान ‘प्रेसिडेंशियल सैल्यूट’ करेंगे। मरीन बैंड चीन और अमेरिका के राष्ट्रगान बजाएगा। 4 एफ-22 रैप्टर और एक बी-2 बॉम्बर जेट फ्लाईओवर करेंगे।
- 24 सितंबर की शाम जिनपिंग के लिए व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर रखा गया है। इसमें इलॉन मस्क, जेफ बेजोस, सुंदर पिचाई, टिक कुक और सैम अल्टमैन जैसे उद्योगपति भी शामिल होंगे।
- 25 सितंबर को जिनपिंग और लियुआन ट्रम्प और फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रम्प के साथ सुबह चाय पिएंगे। नेशनल आर्काइव्स घूमने जाएंगे।
- ट्रम्प और जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत में तीन चीजों पर फोकस होगा- ट्रेड, टेक्नोलॉजी और ताइवान।
- 25 सितंबर की शाम तक जिनपिंग 3 दिन का दौरा पूरा करके अमेरिका से लौट जाएंगे।
मई 2026 में ट्रम्प चीन दौरे पर गए थे। वहां उनके लिए रेड कार्पेट बिछाया गया था। मिलिट्री बैंड और हाथों में झंडे लिए बच्चों ने उनका स्वागत किया। चीनी उप राष्ट्रपति हान झेंग ने अगवानी की थी।
सवाल-2: आखिर जिनपिंग को इतनी तवज्जो क्यों दे रहे ट्रम्प, बदले में क्या चाहिए?
जवाब: अमेरिका में दशकों पुरानी परंपरा रही है कि विदेशी नेता राष्ट्रपति से मिलने व्हाइट हाउस आते हैं, व्हाइट हाउस उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं जाता। ट्रम्प का प्रोटोकॉल तोड़ना सिर्फ शिष्टाचार नहीं, चीन की अहमियत का कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है।
इसकी वजह मोटे-तौर पर 4 मांगों में छिपी है…
1. चीन रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बनाए रखे
- ट्रम्प ने पिछले साल चीन, भारत समेत 90 देशों पर टैरिफ लगाया। चीन ने भी अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाए। दोनों के बीच ‘टैरिफ वॉर’ छिड़ गई। कारोबार पर असर पड़ा ही, जरूरी चीजों की सप्लाई भी ठप पड़ने लगी।
- अक्टूबर 2025 में दक्षिण कोरिया के बुसान में ट्रम्प और जिनपिंग की मुलाकात में ‘ट्रेड ट्रूस’, यानी टैरिफ वॉर पर सीजफायर हुआ। कृषि उत्पाद, क्रिटिकल मिनरल्स, टेक्नोलॉजी वगैरह पर अस्थायी समझौते हो गए।
- इसी के तहत चीन ने रेयर अर्थ मिनरल्स के एक्सपोर्ट कंट्रोल एक साल के लिए टाले थे, जो 10 नवंबर को खत्म हो रहे हैं। ट्रम्प चाहते हैं कि रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बरकरार रहे।
- अमेरिका विदेशों से जितना रेयर अर्थ मिनरल्स खरीदता है, उसमें 70% हिस्सा चीन से आता है। अगर चीन ने सप्लाई रोकी, तो अमेरिकी कारों, हथियार, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स का प्रोडक्शन बहुत धीमा पड़ जाएगा।
बुसान एग्रीमेंट के तहत अमेरिका ने चीन से होने वाले आयात पर औसत टैरिफ 57% से घटाकर 47% कर दिया था। एक साल के लिए नए टैरिफ को रोक दिया था। तस्वीर उसी बैठक की है।
2. चाकू, बेलन, नोटबुक का कारोबार टैरिफ-फ्री हो
- मई 2026 में बीजिंग समिट के दौरान ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ नाम का एक सिस्टम बनाने की चर्चा हुई थी। इसमें ’30 फॉर 30′ फ्रेमवर्क पर सहमति बनी।
- दोनों देश एक-दूसरे के करीब 30 अरब डॉलर के गैर-संवेदनशील और गैर-रणनीतिक सामानों जैसे- जूते, कपड़े, रसोई के सामान, कृषि उत्पाद वगैरह पर टैरिफ में छूट देंगे।
- अमेरिका चाहता है कि यह छूट चाकू, बेलन, नोटबुक, बोर्ड गेम्स जैसे लो-टेक कंज्यूमर प्रोडक्ट्स तक सीमित रहे। जबकि चीन चाहता है कि इसमें सेमीकंडक्टर, टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर वगैरह भी शामिल हों।
3. बड़ी डील की घोषणा, जिससे मिड-टर्म चुनावों में माहौल बने
- मई में ट्रम्प के बीजिंग दौरे के बाद व्हाइट हाउस ने बताया कि 200 बोइंग एयरक्राफ्ट, सोयाबीन पर डील के अलावा 2026-28 तक चीन हर साल अमेरिका से 17 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद खरीदेगा।
- तब चीन की कॉमर्स मिनिस्ट्री ने न तो रकम की पुष्टि की, न सोयाबीन का नाम लिया। सिर्फ कृषि व्यापार बढ़ाने और एयरक्राफ्ट डील की बात कही। यानी यह सब अमेरिकी दावे पर टिका है।
- ट्रम्प चाहते हैं कि ये डील हो या पॉजिटिव बात बने, ताकि चीन से व्यापार घाटा कम हो और नवंबर में मिडटर्म इलेक्शन में ट्रम्प के लिए माहौल बने। पिछले साल अमेरिका को चीन से 202 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ था।
2015 में अमेरिका दौरे पर आए शी जिनपिंग ने वॉशिंगटन स्थित बोइंग की फैक्ट्री का दौरा किया था। यहां से 300 बोइंग खरीदने की डील का ऐलान किया था।
4. चीन के साथ ‘AI हॉटलाइन’ बने, ताकि ये बेलगाम न हो
- अमेरिका ने चीन के साथ एक ‘AI हॉटलाइन’ बनाने की सिफारिश की है। अगर AI टेस्टिंग और डेवलपमेंट के दौरान कोई ऐसा हादसा होता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो, तो ये देश एक-दूसरे को नोटिफिकेशन जारी कर खबर करेंगे।
- बीते दिनों एंथ्रॉपिक और OpenAI जैसी कंपनियों में AI डेवलपमेंट पर काम करने वाले कई सीनियर कर्मचारियों ने इस्तीफे दिए। उनका तर्क था कि AI डेवलपमेंट बेलगाम हो रहा है, जिससे मानवता को खतरा है। इसकी रफ्तार धीमी करनी चाहिए।
- 20 सितंबर को अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीनी वाइस प्रीमियर ही लिफेंग ने इस पर चर्चा की थी। हालांकि चीन ने अमेरिका की सिफारिश मानने का कंफर्मेशन नहीं दिया है।
अमेरिकी थिंकटैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में चीनी कारोबार के एक्सपर्ट स्कॉट कैनेडी के मुताबिक, ‘ट्रम्प प्रशासन को उम्मीद थी कि टैरिफ के एकतरफा भारी दबाव से चीन झुक जाएगा। ऐसा नहीं हुआ। चीन का निर्यात इस साल 28% बढ़ा है। इसलिए मोलभाव में शी की स्थिति ट्रम्प से मजबूत दिख रही है।’
सवाल-3: जिनपिंग अमेरिका से क्या हासिल करने की कोशिश करेंगे?
जवाब: अमेरिकी टैरिफ के बावजूद लगातार दूसरे साल चीन का ट्रेड सरप्लस 1 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकता है। यानी चीन ने जितना सामान दूसरे देशों से खरीदा उससे कहीं ज्यादा उन्हें बेचा है। साफ है कि चीन व्यापार के लिए सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं है।
ऐसे में अमेरिकी दौरे से जिनपिंग 3 चीजें साधना चाहते हैं…
1. अमेरिका ताइवान की आजादी का विरोध करे
- जिनपिंग ने मई में ट्रम्प से साफ किया था कि अमेरिका और चीन के बीच ताइवान सबसे अहम मुद्दा है। इसे ठीक से नहीं संभाला गया, तो दोनों देशों में संघर्ष हो सकता है।
- जिनपिंग की कम्युनिस्ट पार्टी ‘वन चाइना पॉलिसी’ के तहत ताइवान को चीन का हिस्सा मानती है, लेकिन ताइवान खुद को आजाद देश। अमेरिका के ताइवान के साथ कोई कूटनीतिक रिश्ते नहीं हैं, लेकिन वो ताइवान को उसकी रक्षा के लिए मॉडर्न हथियार बेचता आया है।
- मई में शी से मिलने से पहले ट्रम्प ने ताइवान के साथ 14 बिलियन डॉलर की हथियार डील टाल दी थी। शी इस डील को और आगे बढ़ाना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि ट्रम्प कहें कि अमेरिका ताइवान की आजादी का विरोध करता है।
- चीन की फुदान यूनिवर्सिटी में अमेरिकी स्टडीज के डायरेक्टर वू शिनबो के मुताबिक, ‘अगर अमेरिका ताइवान के मुद्दे पर चीन की चिंताओं का ध्यान रखेगा, तो चीन भी अमेरिका से कृषि उत्पाद खरीदने और लॉ एनफोर्समेंट जैसे मुद्दों पर अमेरिका का ध्यान रखेगा।’
अमेरिका कोल्ड वॉर के समय से ताइवान को हथियार बेच रहा है। तस्वीर 2025 में ताइवान की वार्षिक मिलिट्री एक्सरसाइज के दौरान तैनात अमेरिकी पैट्रियट एयर-डिफेंस सिस्टम की है।
2. रेयर अर्थ मिनरल्स के एवज में ज्यादा टैरिफ छूट मिले
- चीन के रेयर अर्थ मिनरल्स का इस्तेमाल गाड़ियों, कंप्यूटर चिप्स और सेमीकंडक्टर बनाने में होता है। 70% मिनरल्स की माइनिंग और 85% रिफाइनिंग चीन में होती है।
- चीन इसे अमेरिका के लिए पूरी तरह से खोलने की बजाय मोलभाव के तौर पर इस्तेमाल करेगा। इसके बदले में ट्रम्प, चीन को सेमीकंडक्टर ऑफर कर सकते हैं और रूस से तेल खरीद को नजरअंदाज कर सकते हैं। चीन भी ज्यादा चीजों पर टैरिफ छूट की मांग कर सकता है।
3. जिनपिंग का भव्य स्वागत, जिससे चीन में छवि मजबूत हो
- जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान वहां संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक बैठक भी चल रही है। जिनपिंग इस बैठक में जाने की बजाय, ट्रम्प के साथ द्विपक्षीय मीटिंग के लिए जा रहे हैं। ऐसे में ट्रम्प का भव्य स्वागत उनके कद को बढ़ाएगा।
- अगले साल चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की 5 साल में होने वाली बैठक है। इसमें जिनपिंग चौथी बार पार्टी के नेता चुने जा सकते हैं। अमेरिका में शक्ति प्रदर्शन और खुद को मजबूत दिखाकर, घर में उनकी छवि मजबूत होगी।
मई 2026 में जिनपिंग ने भी ट्रम्प का भव्य स्वागत किया था। उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर और 21 तोपों की सलामी भी दी गई थी।
सवाल-4: क्या इस दौरे से भारत और दुनिया पर कोई बड़ा असर पड़ेगा?
जवाब: एशियाई और यूरोपीय देशों को डर है कि अगर अमेरिका और चीन साथ आ गए तो ये वर्ल्ड ऑर्डर, यानी दुनिया के नियम खुद तय करेंगे।
AI के क्षेत्र में अमेरिका और चीन ही सबसे तेजी से काम कर रहे हैं। दोनों नेताओं की मीटिंग के बाद पूरी दुनिया में AI को नियंत्रित करने का सिस्टम तैयार हो सकता है।
ईरान जंग शुरू होने के बाद से तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। अगर चीन की मध्यस्थता से अमेरिका ईरान जंग से बाहर निकल पाए और होर्मुज स्ट्रेट के कंट्रोल पर सहमति बन जाए, तो ग्लोबल ऑइल सप्लाई फिर पटरी पर आ सकती है।
अमेरिका और चीन में ट्रेड वॉर की वजह से विदेशी कंपनियों के फैक्ट्री लगाने के लिए भारत विकल्प बनकर उभरा था। अमेरिका-चीन की सुलह से भारत के हाथ से यह मौका निकल सकता है।
ब्रिगेडियर अनिल रमन (रि.) के मुताबिक, ‘एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में चीन को मैनेज करने के लिए अमेरिका भारत से अच्छे रिश्ते बनाकर रखता था। अगर अब अमेरिका-चीन आपस में ही अपने रिश्ते संभालने लगेंगे, तो अमेरिका को भारत की जरूरत कम होगी। लेकिन अगर चीन-अमेरिका में सहमति नहीं बन पाती है, तो अमेरिका के लिए भारत की जरूरत बढ़ जाएगी।’
अमेरिका ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने वाला बिल पास हो गया है। अगर रेयर अर्थ मिनरल्स के बदले अमेरिका चीन को रूसी तेल खरीदने की ढील देता है, तो भारत पर अमेरिका को ऐसा कोई ऑफर देने का दबाव बढ़ेगा, जिससे उसे भी रियायत मिले।
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