जेकेके में हुआ ‘समुद्र मंथन’, पौराणिक कथा में उठे सवाल:नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया निर्देशन, दीया कुमारी रही मौजूद

जेकेके में हुआ ‘समुद्र मंथन’, पौराणिक कथा में उठे सवाल:नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया निर्देशन, दीया कुमारी रही मौजूद




राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से राजस्थान दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में जवाहर कला केंद्र में नाटक ‘समुद्र मंथन’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। इस अवसर पर प्रदेश की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल की ओर से प्रस्तुत इस भव्य नाटक का निर्देशन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया। नाटक में 100 से अधिक कलाकारों ने अपनी सशक्त अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। नाटककार आसिफ अली ने पौराणिक कथा को समकालीन संदर्भों से जोड़ते हुए इसे एक नई दृष्टि प्रदान की। नाटक की शुरुआत ही एक गहरे प्रश्न से होती है, हम कला और साहित्य पर मंथन क्यों करें? और इसका उत्तर पूरे नाटक के अंत में दर्शकों के सामने उभरकर आता है। निर्देशक चित्तरंजन त्रिपाठी का निर्देशकीय कौशल पूरे मंचन में स्पष्ट दिखाई दिया। बड़े स्क्रीन और आकर्षक दृश्य-परिकल्पना के माध्यम से प्रस्तुत किए गए दृश्य दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ते हैं। संगीत और मंच सज्जा ने नाटक को और अधिक जीवंत और गतिशील बना दिया। शुरुआत से अंत तक नाटक की ऊर्जा बरकरार रही, जिससे दर्शक पूरी तरह उससे जुड़े रहे। कहानी के अनुसार, ऋषि दुर्वासा के शाप से शक्तिहीन हुए देवराज इंद्र को राक्षस-राज बलि पराजित कर देता है, जिससे राक्षसी प्रवृत्तियां सृष्टि पर हावी होने लगती हैं। इसके बाद भगवान ब्रह्मा के निर्देश पर देवता भगवान विष्णु से सहायता मांगते हैं, जो उन्हें समुद्र मंथन करने का मार्ग बताते हैं। इस मंथन से जहां अमृत प्राप्त होता है, वहीं विष भी निकलता है, जिसे भगवान शिव धारण कर संसार को बचाते हैं। नाटक का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। यह दर्शाता है कि आज विकास की दौड़ में हम उसके दुष्परिणामों पर विचार करना भूल गए हैं। जिस प्रकार समुद्र मंथन से विष भी निकला था, उसी प्रकार आधुनिक विकास के साथ प्रदूषण, प्लास्टिक और रासायनिक खतरे भी सामने आ रहे हैं। यह नाटक समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है कि हम अपने भविष्य, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के प्रति कितने जिम्मेदार हैं। नाटक ‘समुद्र मंथन’ की विशेषता यह रही कि इसमें पौराणिकता को बनाए रखते हुए आधुनिकता का सुंदर समावेश किया गया। यह प्रस्तुति न केवल एक सांस्कृतिक अनुभव रही, बल्कि सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम भी साबित हुई।



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