Asaram Life Sentence Stays | Jodhpur HC Order on Rape Case

Asaram Life Sentence Stays | Jodhpur HC Order on Rape Case


नाबालिग से रेप के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट (जोधपुर मुख्यपीठ) ने आसाराम की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने आसाराम की अंतरिम जमानत तुरंत रद्द करते हुए सरेंडर करने का आदेश दिया है। साथ ही तत्काल गिरफ्तारी का वारंट भी जारी कर दिया है।

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यानी अब आसाराम को हर हाल में तुरंत जेल जाना होगा। फैसले के बाद आसाराम कल जोधपुर पहुंच जाएगा।

92 पन्नों के फैसले में उम्रकैद से लेकर सह-आरोपियों के बरी होने तक कई अहम बिंदु शामिल हैं। बचाव पक्ष के 50 करोड़ की वसूली वाले तर्क को कोर्ट ने क्यों नकारा? और जब बंद कमरे की घटना में कोई चश्मदीद नहीं था, तो अपराध कैसे साबित हुआ? आइए ‘भास्कर एक्सप्लेनर’ में 16 सवालों के जरिए समझते हैं इस पूरे फैसले को।

सबसे पहले जानिए- क्या है पूरा मामला?

  • अगस्त 2013 में जोधपुर स्थित आश्रम में नाबालिग छात्रा के साथ रेप के आरोप में आसाराम को गिरफ्तार किया गया था। लंबी सुनवाई के बाद जोधपुर की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 25 अप्रैल 2018 को उन्हें दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
  • आसाराम ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट में 16 फरवरी से 20 अप्रैल 2026 तक डे-टू-डे सुनवाई हुई थी। खंडपीठ ने 20 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसे 27 मई को सुनाया गया।

1. सवाल: हाईकोर्ट का फैसला क्या आया?

जवाब: राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से बलात्कार मामले में आसाराम की आजीवन कारावास (शेष प्राकृतिक जीवन तक) की सजा को बरकरार रखा है। उसकी अंतरिम जमानत रद्द कर दी गई। तत्काल गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है। यानी उसे अब सरेंडर कर जेल जाना होगा। आसाराम हरिद्वार से दिल्ली के लिए रवाना हो चुका है, वहां से जोधपुर आएगा।

2. सवाल: आसाराम अभी तक बाहर कैसे था? जवाब: साल 2018 में निचली अदालत (विशेष पॉक्सो कोर्ट) के दोषी ठहराए जाने के बाद आसाराम ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील पर सुनवाई के दौरान आसाराम अंतरिम जमानत दी गई थी। अब हाईकोर्ट ने अपील पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया है और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है, तो इस अंतरिम जमानत का आधार समाप्त हो गया है।

3.सवाल: पीड़िता कौन है और घटना कहां हुई? जवाब: पीड़िता उस समय नाबालिग(16) थी, जो मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा स्थित आसाराम के गुरुकुल में कक्षा 12 की छात्रा थी। घटना 15 अगस्त 2013 की रात जोधपुर के मणई गांव स्थित आसाराम की कुटिया में हुई। परिवार उत्तर प्रदेश का रहने वाला है।

छिंदवाड़ा स्थित आसाराम के गुरुकुल में नाबालिग के साथ रेप हुआ था (फाइल फ़ोटो)।

4. सवाल:’भूत का साया’ वाली बात क्या थी, क्या परिवार सच में माना?

जवाब: 6 अगस्त 2013 को पीड़िता हॉस्टल में गिर गई थी। हॉस्टल वार्डन शिल्पी ने परिजनों को फोन कर कहा- बच्ची पर ‘भूत का साया’ है और आसाराम ने उसे ‘भूत उतारने’ के लिए बुलाया है। गुरुकुल डायरेक्टर शरत चंद्र ने भी यही कहा। परिवार सालों से आसाराम का अंध-श्रद्धालु था और दीक्षा ले चुका था। कोर्ट ने माना कि किसी गुरु पर आस्था रखने वाले भक्त के लिए ऐसी बात मान लेना अस्वाभाविक नहीं था।

5. सवाल: हाईकोर्ट ने शिल्पी और शरत चंद्र को बरी क्यों किया? जवाब: हाईकोर्ट ने माना कि यह साबित नहीं हुआ कि जब शिल्पी और शरत चंद्र ने परिजनों को पीड़िता को आसाराम के पास भेजने को कहा, तब उन्हें यह पता था कि आसाराम भविष्य में रेप जैसा अपराध करेगा। आपराधिक साजिश साबित करने के लिए पहले से ‘सहमति’ होना जरूरी है। पूर्व जानकारी साबित न होने के कारण उन्हें बरी कर दिया गया।

31 अगस्त 2013 को पुलिस ने आसाराम को गिरफ्तार किया था। (फ़ाइल फ़ोटो)।

6. सवाल: आसाराम को किन आरोपों से बरी किया, किन पर सजा बरकरार है? जवाब:आपराधिक साजिश रचना और सामूहिक रेप के आरोपों से बरी किया गया है। सजा बरकरार: मानव शोषण के उद्देश्य से बंधक बनाना, आपराधिक धमकी देना, और विश्वास का फायदा उठाकर नाबालिग के साथ रेप करने के सभी गंभीर आरोपों और पॉक्सो एक्ट के कड़े प्रावधानों के तहत सजा बरकरार रखी गई है।

7. सवाल: पीड़िता की उम्र पर विवाद क्यों था जवाब: बचाव पक्ष ने दावा किया था कि घटना के समय पीड़िता 18 साल से ऊपर थी। इसके लिए एक पुराने रजिस्टर की फर्जी एंट्री पेश की गई। लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि वह रजिस्टर बाद में बदला गया था। कोर्ट ने 10वीं कक्षा के मूल सर्टिफिकेट को सर्वोच्च साक्ष्य माना, जिसमें जन्मतिथि 4 जुलाई 1997 दर्ज थी, जिससे साबित हुआ कि घटना के समय वह नाबालिग थी।

8. सवाल: मेडिकल रिपोर्ट में बाहरी चोट नहीं थी, तो रेप कैसे साबित हुआ? जवाब: मेडिकल जांच में हाइमन सुरक्षित पाया गया था और शरीर पर बाहरी चोट नहीं थी। कोर्ट ने माना कि पीड़िता के स्पष्ट बयान के आधार पर रेप सिद्ध होता है।

9. सवाल: FIR में 5 दिन की देरी को कोर्ट ने कैसे माना और दिल्ली में जीरो FIR क्यों हुई? जवाब: कोर्ट ने माना कि यह देरी स्वाभाविक है। एक 16 वर्षीय बच्ची, जो अपने परमपूज्य ‘गुरु’ के कृत्य से सदमे में थी, उसके लिए हिम्मत जुटाने में समय लगता है। परिवार सबसे पहले आसाराम से मिलने दिल्ली गया था। जब पता चला कि वह जोधपुर चला गया है, तो जोधपुर जाने में लगने वाले अतिरिक्त समय से बचने के लिए परिवार ने दिल्ली के पुलिस स्टेशन में ही तुरंत जीरो FIR दर्ज करवा दी।

10.सवाल: फोरेंसिक जांच न होने पर कोर्ट का क्या जवाब था? जवाब: घटना 15 अगस्त को हुई और जोधपुर में जांच 21 अगस्त को शुरू हुई। कोर्ट ने कहा- इतने दिन बीत जाने के बाद घटनास्थल से फोरेंसिक सबूत मिलना वैसे भी संभव नहीं था। इसलिए, इस जांच के न होने से पीड़िता का मुख्य बयान कमजोर नहीं होता।

11. सवाल: 50 करोड़ की जबरन वसूली की साजिश वाला तर्क क्यों खारिज हुआ? जवाब: बचाव पक्ष का आरोप था कि 50 करोड़ रुपए ऐंठने के लिए झूठा मामला बनाया गया। कोर्ट ने कहा- यदि यह पहले से रची गई साजिश होती, तो परिजन मणई आश्रम से सीधे जोधपुर पुलिस थाने जाते। दिल्ली जाकर जीरो FIR के लंबे रास्ते से गुजरना किसी साजिश की कहानी से मेल नहीं खाता।

14. सवाल: इस मामले में गवाही का क्या हाल रहा? जवाब: अभियोजन पक्ष ने 44 गवाह पेश किए, जिनमें पीड़िता स्वयं, उसके माता-पिता, डॉक्टर और पुलिस अधिकारी शामिल थे। बचाव पक्ष ने 31 गवाह पेश किए। पीड़िता से लंबे समय तक तीखे सवाल किए गए, फिर भी उसके मुख्य बयान को कोई हिला नहीं सका।

15. सवाल: ‘रिपोर्टेबल’ फैसले का क्या मतलब होता है? जवाब: जब हाईकोर्ट किसी फैसले को ‘Reportable’ घोषित करता है, तो इसका अर्थ है कि यह फैसला भविष्य में अन्य समान मामलों में एक नजीर (उदाहरण) के रूप में काम आएगा।

16. सवाल: फैसले में पीड़िता के मानसिक आघात को कोर्ट ने कैसे रेखांकित किया? जवाब: कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि पीड़िता सहानुभूति नहीं, बल्कि न्याय मांग रही है। कोर्ट ने उसकी इस भावना का समर्थन किया कि उत्पीड़क के लिए कारावास केवल शारीरिक है, लेकिन एक मासूम पर थोपी गई सजा उसकी आत्मा पर है, जो आजीवन रहेगी और जिसमें कोई पैरोल नहीं होती।

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राजस्थान हाईकोर्ट (जोधपुर) ने बुधवार (27 मई) सुबह आसाराम की सजा पर फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने नाबालिग से यौन उत्पीड़न के केस में आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस अरूण मोंगा व जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया। केस में सह आरोपी शिल्पी व शरतचंद को बरी किया गया है। पढ़ें पूरी खबर



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