आखरी बार चेहरा तो देख लूँ…:सूनी आँखों से तकती माँ को मिला बेटे का पार्थिव शरीर; 16 दिन बाद अर्मेनिया से लौटा शव

आखरी बार चेहरा तो देख लूँ…:सूनी आँखों से तकती माँ को मिला बेटे का पार्थिव शरीर; 16 दिन बाद अर्मेनिया से लौटा शव




जिस घर में कुछ ही दिनों बाद शहनाइयाँ बजनी थीं, जहाँ जसविंदर के सिर पर सेहरा सजाने की तैयारियाँ चल रही थीं, वहाँ आज चीखें और मातम का सन्नाटा पसरा है। गरीबी से तंग आकर परिवार का सहारा बनने विदेश गए 32 वर्षीय जसविंदर सिंह का पार्थिव शरीर जब 16 दिन बाद आर्मेनिया से उसके पैतृक गांव संगोजला पहुँचा, तो एक माँ का कलेजा फट पड़ा। एक साल पहले ही पति को खो चुकी बुजुर्ग माँ की आँखें अपने लाल के अंतिम दर्शन के लिए तरस रही थीं—उनकी बस एक ही अंतिम गुहार थी, “चाहे जो हो जाए, मेरे बेटे को आखिरी बार मेरे पास ला दो ताकि मैं अपने हाथों से उसे अंतिम विदाई दे सकूँ।” नम आँखों और रोते-बिलखते परिजनों के बीच जसविंदर का अंतिम संस्कार कर उसे अलविदा कहा गया। किस्मत का क्रूर मज़ाक: पिता के अंतिम दर्शन न कर सका, अब खुद तिरंगे की छांव में लौटा तंगहाली में उम्मीद की किरण बने संत बलबीर सिंह सीचेवाल जब उम्मीद की आखिरी किरण भी धुंधलाने लगी, तब पीड़ित परिवार ने 15 जुलाई को राज्यसभा सांसद संत बलबीर सिंह सीचेवाल का दरवाज़ा खटखटाया। संत सीचेवाल ने एक रोती हुई माँ के दर्द को समझा और बिना पल गँवाए मोर्चा संभाला। उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय, आर्मेनिया में भारतीय दूतावास और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से लगातार संपर्क साधकर कागज़ी अड़चनों को दूर कराया। संत सीचेवाल के अथक प्रयासों का ही नतीजा था कि महज़ 16 दिनों के भीतर, बिना किसी आर्थिक बोझ के, जसविंदर का पार्थिव शरीर उसके गाँव संगोजला पहुँचा दिया गया। माँ का छलका दर्द, ग्रामीणों ने जताया आभार जब जसविंदर का शव घर पहुँचा, तो पूरे गांव की आँखें नम हो गईं। परिजनों और ग्रामीणों ने संत बलबीर सिंह सीचेवाल का दिल की गहराइयों से धन्यवाद किया। लोगों ने कहा कि संकट के इस दौर में संत सीचेवाल ने केवल एक नेता या जनप्रतिनिधि का फर्ज़ नहीं निभाया, बल्कि एक सच्चे मसीहा और हमदर्द की तरह एक बेबस माँ की आखिरी इच्छा पूरी की है। यह कोई पहली घटना नहीं है। विदेशों में जान गँवाने वाले 62 भारतीय नागरिकों के पार्थिव शरीर संत बलबीर सिंह सीचेवाल के व्यक्तिगत और मानवीय प्रयासों से बिना किसी खर्च के उनके बिलखते परिवारों तक पहुँचाए जा चुके हैं। संकट में फँसे भारतीय प्रवासियों के लिए वे लगातार एक मजबूत ढाल बने हुए हैं।



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