नक्सलवाद से मुक्ति के बाद बदलाव…:पहली बार अबूझमाड़ के नक्सल प्रभावित 239 गांवों में पहुंच रहा प्रशासन, मकानों और खेतों का मिलेगा मालिकाना हक

नक्सलवाद से मुक्ति के बाद बदलाव…:पहली बार अबूझमाड़ के नक्सल प्रभावित 239 गांवों में पहुंच रहा प्रशासन, मकानों और खेतों का मिलेगा मालिकाना हक




बस्तर का अबूझमाड़ क्षेत्र, जो कभी नक्सलियों की मजबूत शरणस्थली माना जाता था, अब यहां तस्वीर बदल रही है। केंद्र की ओर से नक्सलवाद से मुक्त होने के ऐलान के बाद यह क्षेत्र प्रशासनिक दायरे में आ रहा है। यहां के 239 गांवों में पहली बार सरकारी सर्वे शुरू हुआ है। इस सर्वे के जरिए यह पता लगाया जा रहा है कि किस गांव में कितने परिवार रहते हैं, परिवारों में कितने सदस्य हैं, कितने लोग खेती करते हैं और किसके कब्जे में कितनी जमीन है। राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम ने इस काम की शुरुआत कर दी है। खास बात यह है कि पूरे अबूझमाड़ क्षेत्र का सैटेलाइट सर्वे रुड़की आईआईटी की टीम के माध्यम से कराया जा रहा है। सैटेलाइट इमेज के आधार पर गांवों और आबादी क्षेत्रों का प्रारंभिक नक्शा तैयार किया जा रहा है, जिसके बाद फील्ड टीम मौके पर जाकर हर घर और जमीन का सत्यापन करेगी। सर्वे के अंतिम चरण में दावा-आपत्ति के बाद जो जहां रहता है और जितने इलाके में खेती कर रहा है, उसे उस जगह और खेतों का मालिकाना हक दिया जाएगा। नारायणपुर जिले का ओरछा ब्लॉक, जिसे अबूझमाड़ कहा जाता है, लंबे समय तक प्रशासन की पहुंच से बाहर रहा। आजादी के बाद भी यहां कई गांव सड़क और संपर्क से कटे रहे। जब सड़क निर्माण शुरू हुआ तो नक्सली गतिविधियां बढ़ गईं और पूरा इलाका उनकी पनाहगाह बन गया। इसी कारण यहां गांवों, आबादी और जमीन का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार नहीं हो पाया। अब सुरक्षा बलों की मौजूदगी और सड़क विस्तार के बाद हालात बदल रहे हैं। प्रशासनिक टीमें पहली बार गांवों तक पहुंच रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, जो परिवार जहां रह रहा है, उसे उसी जगह का मालिकाना हक दिया जाएगा। वहीं खेती करने वाले किसानों को उनकी जोत के अनुसार अधिकार पत्र दिए जाएंगे। इससे वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे वनवासियों को कानूनी पहचान और अधिकार मिल सकेंगे। 3 लाख हेक्टेयर में घना जंगल, फॉरेस्ट भवनों को बरसों पहले ब्लॉस्ट से उड़ाया
अबूझमाड़ करीब 3 लाख हेक्टेयर में फैले घने जंगलों का क्षेत्र है, जो बस्तर, नारायणपुर और बीजापुर जिलों में फैला है। सबसे बड़ा हिस्सा नारायणपुर में आता है। बस्तर के सीसीएफ आलोक तिवारी के अनुसार, किस्टाराम और गोरापल्ली में वन विकास कार्य फिर शुरू किए जा रहे हैं, जो करीब 35 साल पहले नक्सली प्रभाव के कारण बंद हो गए थे। कांकेर के सीसीएफ राजेश चंदेले ने बताया कि जगरगुंडा और फरसेगढ़ जैसे इलाकों में पहले वन विभाग के दफ्तर थे, जिन्हें नक्सलियों ने वर्षों पहले ब्लास्ट कर नष्ट कर दिया था। गांवों में अब तक क्यों नहीं पहुंच पाया प्रशासन सर्वे शुरू, हर ग्रामीण का मेडिकल चेकअप भी बस्तर के संभाग आयुक्त डोमन सिंह ने बताया कि घने जंगलों में बसे गांव में सर्वे की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। हर ग्रामीण का मेडिकल चेकअप भी किया जाएगा। नक्शा खसरा तैयार करने के बाद मलिकाना हक की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।



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