Gang War UP | Gangster Murder Case Verdict After 4 Years
मुख्तार मलिक की मौत के बाद मामला सिर्फ एक हत्या का नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे जाल का बन गया, जिसमें कई लोग शामिल थे और हर किसी की अपनी भूमिका थी। पुलिस के लिए यह सिर्फ हत्यारों को पकड़ने का मामला नहीं था, बल्कि यह समझने का भी था कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम
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जांच की शुरुआत उस फोन कॉल से हुई, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को जन्म दिया था। मुख्तार और अब्दुल बंटी के बीच हुई बातचीत को खंगाला गया। यह साफ था कि यह कोई सामान्य बहस नहीं थी। इसमें सीधी चुनौती थी और उस चुनौती को स्वीकार भी किया गया था।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, पुलिस को समझ में आने लगा कि यह कोई अचानक हुआ हमला नहीं था। यह एक प्लान था, जिसे फोन कॉल के बाद ही एक्टिव किया गया। आरोपियों ने पहले से लोकेशन-समय तय किया और सबसे अहम रणनीति बनाई।
मुख्तार मलिक भोपाल का कुख्यात गैंगस्टर था।
भीमसागर बांध का वह इलाका इसलिए चुना गया क्योंकि वह सुनसान था और पानी के बीच था। यहां हमला करना आसान था और सबूतों को मिटाना भी। यह सोच ही बताती है कि आरोपी कितनी गहराई से प्लानिंग कर चुके थे। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने पहले से वहां पहुंचकर पोजिशन ले ली थी। उन्हें पता था कि मुख्तार आएगा। शायद उसे उकसाया गया था या यह पूरा सेटअप ही उसे वहां लाने के लिए बनाया गया था। जैसे ही वह पहुंचा, उसे खत्म कर दिया गया।
अब धीरे-धीरे इस पूरी साजिश के पीछे की असली वजह भी सामने आने लगी। शुरुआत में मछली ठेकेदारी का विवाद इस हत्या का कारण बताया जा रहा था, लेकिन जांच ने यह साफ कर दिया कि यह सिर्फ एक ट्रिगर था। असली वजह थी पुरानी गैंग रंजिश और इलाके में वर्चस्व की लड़ाई। मुख्तार मलिक लंबे समय से अपराध की दुनिया में सक्रिय था। भोपाल, रायसेन (MP) और उत्तर प्रदेश तक उसके खिलाफ करीब 60 मामले दर्ज थे। उसने अपने नेटवर्क और ताकत के दम पर एक अलग पहचान बना ली थी, लेकिन उसी के साथ उसने कई दुश्मन भी खड़े कर लिए थे।
मुख्तार इसी जगह में बेसुध हालत में मिला था।
अब्दुल बंटी और उसके साथी भी उसी दुनिया का हिस्सा थे। वे सिर्फ मुकाबला नहीं करना चाहते थे, बल्कि इस वारदात के जरिए यह दिखाना चाहते थे कि अब इलाके में असली ताकत किसकी है। यह हत्या सिर्फ एक व्यक्ति को खत्म करने के लिए नहीं की गई थी, बल्कि यह एक संदेश था। यह संदेश सीधे तौर पर उनके विरोधियों के लिए था। इस वारदात के जरिए उन्होंने अपने वर्चस्व का ऐलान किया।
पुलिस ने इस मामले में तेजी से कार्रवाई की। तकनीकी सबूतों की मदद से एक-एक कड़ी को जोड़ा गया। कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा और अन्य डिजिटल सबूतों ने इस केस को मजबूत आधार दिया। पूछताछ के दौरान आरोपियों ने कई अहम जानकारियां दीं, जिससे पूरी साजिश की तस्वीर साफ होती चली गई। आखिरकार पुलिस ने कुल 14 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। हर गिरफ्तारी के साथ इस केस की गुत्थी सुलझती गई और यह साफ होता गया कि यह हत्या पूरी तरह से योजनाबद्ध थी।
मुख्तार मलिक ने जंगल के रास्ते भागने की कोशिश की, लेकिन पहाड़ी के कारण ऐसा नहीं कर पाया।
मामला कोर्ट तक पहुंचा, जहां इस पूरे घटनाक्रम की कानूनी जांच शुरू हुई। कोर्ट में 44 गवाह पेश किए गए और 94 दस्तावेजों को सबूत के तौर पर रखा गया। हर गवाह और हर दस्तावेज इस बात की पुष्टि कर रहा था कि यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि एक गहरी साजिश का नतीजा थी।
सुनवाई करीब चार साल तक चली। इस दौरान हर पहलू पर विस्तार से बहस हुई। बचाव पक्ष ने पूरी कोशिश की कि सबूतों को कमजोर किया जाए और आरोपियों को राहत मिले, लेकिन अभियोजन पक्ष ने मजबूत तरीके से अपनी दलीलें पेश कीं और एक-एक कड़ी को जोड़कर पूरी कहानी अदालत के सामने रख दी।
आखिरकार अप्रैल 2026 में इस मामले में फैसला सुनाया गया। एडीजे कोर्ट ने अपने निर्णय में साफ कहा कि यह हत्या पूरी तरह से सुनियोजित थी और इसमें शामिल आरोपियों ने मिलकर इस साजिश को अंजाम दिया था। अदालत ने अब्दुल बंटी और वसीम राजा सहित 11 को उम्रकैद की सजा सुनाई। वहीं कोटा के शफीक को 7 साल की सजा दी गई। इसके साथ ही सभी दोषियों पर जुर्माना भी लगाया गया।

