Chittorgarh Hospital Negligence | Mother Dies, Newborn Suffers, Mummy Ka Intezar
कोटा11 मिनट पहले
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कहीं तीन दिन का नवजात मां की गोद के बिना तड़प रहा है, तो कहीं मासूम बेटियां दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए बैठी हैं कि शायद मम्मी अब घर लौट आएंगी। कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती महिलाओं की हालत अब भी गंभीर बनी हुई है। कई महिलाओं की डायलिसिस हो चुकी है। प्लेटलेट्स चढ़ाई जा रही हैं और जयपुर से आई डॉक्टरों की टीम इलाज में जुटी हैं। इन सबके बीच सबसे बड़ा संघर्ष उन छोटे-छोटे बच्चों का है, जिन्हें अभी तक यह भी समझ नहीं है कि उनकी मां किस दर्द से गुजर रही है। कोटा के मेडिकल कॉलेज के नए अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद 2 महिलाओं की मौत हो गई है, जबकि 6 महिलाओं की किडनी फेल है। वो भी जिंदगी के लिए जंग लड़ रही हैं। इनके घरों में चीख-पुकार मची है।
पायल की मौत के बाद उसके बेटे को परिवार वाले संभाल रहे हैं। परिजनों ने कहा- मां के बिना दूध के बच्चे का वजन घट गया है। मां का दूध तो हर बच्चे का हक होता है, लेकिन इसके नसीब में पाउडर का दूध लिखा है।
अब तक 2 महिलाओं की मौत, 7 की किडनी फेल
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के गायनिक वार्ड में 4 मई को सिजेरियन डिलीवरी के बाद 7 महिलाओं की किडनी फेल हो गई थी। इनमें से पायल (28) की 5 मई को मौत हो गई थी। वहीं ज्योति (20) ने 7 मई को दम तोड़ दिया। वहीं शुक्रवार को एक और मामला सामने आया। इसमें एक महिला किरण की भी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। उसे निजी अस्पताल ले जाया गया है, जहां डायलिसिस चल रही है।
पायल की तस्वीर के पास बैठी उसकी सास। नवजात की जिम्मेदारी अब वही उठा रही हैं।
पायल के नवजात बच्चे की भी तबीयत खराब है, उसे बुखार है। आधा किलो वजन कम हो गया है।
मां का चेहरा तक नहीं देख पाया नवजात, बुआ-दादी संभाल रहे
चित्तौड़गढ़ निवासी पायल अब इस दुनिया में नहीं हैं। उसने बेटे को जन्म दिया, लेकिन किस्मत इतनी बेरहम निकली कि वह अपने बच्चे का चेहरा तक नहीं देख सकी। नवजात को मां का स्पर्श भी नसीब नहीं हुआ। अब तीन दिन के मासूम को उसकी बुआ और दादी संभाल रही हैं।
बच्चे की बुआ टीना की आंखें भर आती हैं। वह कहती हैं- मां का दूध तो हर बच्चे का हक होता है, लेकिन इसके नसीब में पाउडर का दूध लिखा था। कोई बच्चे को गोद में लेकर चुप कराता है, तो कोई उसे सुलाने की कोशिश करता है, लेकिन मां की कमी शायद वह मासूम भी महसूस कर रहा है।
टीना बताती हैं- जब बच्चा पैदा हुआ था, तब उसका वजन ढाई किलो था, अब घटकर दो किलो रह गया। उसे बुखार भी है। डर लगता है, कहीं उसे कुछ हो न जाए। तीन दिन से ठीक से सोए भी नहीं हैं। कभी दादी संभालती हैं, कभी मैं। मां के बिना बच्चा आखिर कैसे पल पाएगा। उन्होंने कहा- पायल की पहले डिलीवरी हुई थी, तब बच्चा पेट में ही खत्म हो गया था। इस बार बेटा हुआ, लेकिन अब वह बिना मां के रह गया।
मां के बिना रागिनी की बच्चियां गुमसुम सी रहती हैं। मौसी और नानी उन्हें संभाल रही हैं।
बच्चियों का स्कूल जाना हुआ बंद, मौसी के घर रह रहीं
अस्पताल के आईसीयू में रागिनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रही है। घर पर उसकी सात साल की बेटी तृषा और तीन साल की ईवा हर दिन मां का इंतजार कर रही हैं। 4 मई के बाद दोनों बच्चियों ने अपनी मां को नहीं देखा। परिवार बच्चियों को अस्पताल लेकर आया था, लेकिन वहां का माहौल देखकर बच्चियां घबरा जाती थीं। अब दोनों अपनी मौसी के घर हैं। मौसी कभी किताब दिखाकर उन्हें बहलाने की कोशिश करती हैं। कभी खिलौनों से उनका ध्यान बांटती हैं। थोड़ी देर बाद दोनों फिर रो पड़ती हैं कि हमें मम्मी के पास जाना है।
बच्चियों का स्कूल जाना बंद हो चुका है। खाना भी ठीक से नहीं खातीं। उन्हें बस इतना पता है कि घर में छोटा भाई आया है और मम्मी की तबीयत बहुत खराब है। बड़ी बेटी अपनी छोटी बहन को भी संभालने की कोशिश करती है। वह रोती है तो उसे चुप कराने की कोशिश करती है।
बच्ची नानी के गले लगकर रोती है, बोली- मेरी मम्मी को तो कुछ नहीं होगा
रागिनी की मां बात करते-करते रो पड़ीं। बोलीं- मेरी बच्ची के साथ बहुत अन्याय हुआ है। बड़ी दोहती समझदार है। मेरे गले लगकर रोती है और पूछती है कि नानी, मेरी मम्मी घर कब आएगी। मेरी मम्मी को तो कुछ नहीं होगा ना। मैं क्या जवाब दूं उन बच्चियों को। मेरी बेटी अंदर दर्द से तड़प रही है। हालत में कोई सुधार नहीं है। बस भगवान से यही दुआ है कि मेरी बच्ची बच जाए। मेरी बेटी को सही करवा दो। हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। डायलिसिस करवाया है, उससे पहले प्लेटलेट्स चढ़वाई।
धन्नी बाई की दो बेटियां घर पर अपनी मां का इंतजार कर रही हैं।
अस्पताल में मां, घर पर रोती बेटियां
धन्नी बाई ने भी चार मई को बेटे को जन्म दिया था, लेकिन जन्म के कुछ घंटों बाद ही उसकी हालत बिगड़ गई। अब वह एसएसबी ब्लॉक के आईसीयू में भर्ती है और हालत गंभीर बनी हुई है। घर पर उसकी दो बेटियां हैं। एक चौथी क्लास में पढ़ती है और दूसरी एलकेजी में। दोनों को उनकी बुआ संभाल रही हैं।
धन्नी के पति मोहनलाल ने कहा- पांच दिन से बच्चियों को देखा तक नहीं। अस्पताल में पत्नी को अकेले छोड़ नहीं सकते और बच्चियों को यहां ला नहीं सकते। फोन पर बात होती है तो बस यही पूछती हैं पापा- घर कब आओगे। हमें मम्मी से मिलना है। मोहन का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है। कच्चा मकान है। पिता खुद बीमार रहते हैं, मानसिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में पूरे परिवार का बोझ अब छोटी बहन पर आ गया है।
उधर, नवजात बच्चा एनआईसीयू में भर्ती है। घर में दो मासूम बच्चियां मां के बिना सो नहीं पा रहीं। पड़ोसी विजयलक्ष्मी ने बताया- हम भी जाकर बच्चियों को संभाल रहे हैं। कोई भी जरूरत होती है तो पता कर लेते हैं। बच्चियां बिना मां के पूरी तरह अकेले हो गई हैं। बुआ संभाल रही है, लेकिन मां मां ही होती है।
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